Thursday, December 31, 2015

मोटिवेशन : नये साल का संकल्प

                                                                      -मिलन  सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर... 
एक और साल  बीत  गया. एक नया साल दस्तक दे रहा है. सब जानते हैं कि गुजरा हुआ वक्त कभी लौट कर नहीं आता, आती रहती हैं तो केवल गुजरे वक्त की खट्टी -मीठी यादें. पर क्या सिर्फ यादों के सहारे  दुनिया में जी पाना मुमकिन है या यथार्थ को स्वीकार कर आगे की यात्रा तय करनी पड़ती है ? हमारे व्यक्तिगत जीवन में बीते साल भी बहुत कुछ अच्छा हुआ ही होगा, कुछ नहीं भी. ऐसे मिश्रित अनुभव–अनुभूति से हमारा सरोकार रहा है और आगे भी रहेगा. यही तो जीवन का सतरंगी शाश्वत रूप है, क्यों? 

 सच कहें तो हमारे देश की यात्रा भी हमारे सम्मिलित जीवन यात्रा का प्रतिरूप ही तो है . सब मानते हैं कि देश विकास की यात्रा पर तो जरुर चल रहा है, लेकिन गति अपेक्षा से काफी धीमी है. तभी तो आजादी के करीब सात दशक बाद भी हमारे करोड़ों भाई-बहनों को अब तक  गरीबी, बीमारी, बेकारी, भूखमरी जैसे आर्थिक–सामाजिक समस्याओं से दिन–रात जूझना पड़ रहा है. कारण अनेक हैं, पर एक बड़ा कारण देश के अनेक भागों में कारण-अकारण अशांति का माहौल बना कर विकास की यात्रा में व्यवधान उपस्थित करने वाले तत्वों की कोशिशों के कामयाब होते रहने का है. 

हम सब जानते हैं कि हमारा देश विविधताओं से भरा एक विशाल देश है. ‘अनेकता में एकता’ विश्व के इस सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश की अनूठी पहचान रही है. हम यह भी जानते हैं कि किसी भी देश को मजबूत बनाने के लिए व्यक्ति व समाज का मजबूत होना अनिवार्य है. इसके लिए देश में होने वाले सामाजिक-आर्थिक विकास का लाभ समाज के सभी तबके को मिलना जरुरी है. और विकास के रफ़्तार को बनाये रखने के लिए समाज के विभिन्न वर्गों–समुदायों के बीच एकता और भाईचारा का होना आवश्यक है. 

हर अमन पसंद एवं विकासोन्मुख देश की तरह हमारे देश में भी अधिकांश लोग शान्ति, एकता और विकास के पक्षधर हैं; न्यायपालिका सहित देश के सभी संवैधानिक संस्थाओं पर उनका विश्वास है; वे तोड़-फोड़ या दंगे-फसाद में शामिल नहीं होते हैं और कानून का सम्मान करते हैं. विरोध की नौबत आने पर  वे गाँधी जी द्वारा बताये गए सत्याग्रह जैसे अचूक माध्यम का सहारा लेते हैं. 

इसके विपरीत, कुछ मुट्ठी भर लोग हर घटना–दुर्घटना के वक्त येन-केन प्रकारेण समाज में विद्वेष व  घृणा का माहौल बनाने की चेष्टा करते हैं, जिससे वे अपना निहित स्वार्थ सिद्ध कर सकें. ऐसे ही लोग देश के विभिन्न हिस्सों में छोटी -बड़ी घटनाओं–दुर्घटनाओं के बाद अकारण ही निजी एवं सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने में आगे रहते हैं; समाज में उन्माद एवं अविश्वास का बीज बो कर विकास के गति को क्षति पहुंचाते हैं. इससे सबसे ज्यादा  नुकसान समाज के सबसे गरीब लोगों को होता है. इसके अन्य अनेक अनिष्टकारी आयाम भी हैं, जिनसे हम अपरिचित नहीं हैं.

‘नये साल के संकल्प’ की चर्चा अगले कुछ दिनों तक होती रहेगी. होनी भी चाहिए. अच्छे संकल्पों-कार्यों की सही चर्चा जितनी ज्यादा होगी, हमारे समाज में उतना ही सकारात्मक माहौल बनेगा, उतनी ही तीव्रता से अच्छाई भी फैलेगी. कहने का अभिप्राय यह कि आज का समय समाज के करोड़ों अमन पसंद एवं जागरूक लोगों, खासकर युवाओं के लिए यह संकल्प लेने का है कि हम हर अच्छे काम में एक दूसरे की यथा संभव मदद करेंगे. साथ ही साथ सामाजिक सौहार्द और भाईचारे को बिगाड़ने की चेष्टा करनेवाले चंद लोगों  के नापाक इरादों को नाकाम करने में स्थानीय प्रशासन की मदद करेंगे, जिससे प्रशासन को इन असामाजिक लोगों के विरुद्ध त्वरित कार्रवाई करने में कुछ आसानी हो जाय. 

सच मानिए, तभी जाकर हम सब शान्ति व खुशहाली के साथ रहते हुए देश और समाज को तीव्र गति से उन्नत व मजबूत बना पायेंगे. तभी भारत एक विश्व शक्ति बन भी पायेगा और सच्चे मायने में ऐसा देश कहलाने का हकदार भी. 

“हैप्पी न्यू इयर” कहने की सार्थकता भी तो इसी में है, क्यों ?  

           और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 

Tuesday, December 15, 2015

लघु कथा : मतलब

                                                                                                - मिलन  सिन्हा 

रेलवे प्लेटफार्म के मैगेजीन स्टॉल पर एक पत्रिका उलट रहा था कि उसी समय पीठ पर किसी ने हल्की-सी धौल जमायी . मुड़कर देखा तो वह कुमार था , पुराना सहपाठी. हाथ में ब्रीफकेस लिए वह मुस्करा रहा था. ख़ुशी हुई उसे देखकर, उससे मिलकर. करीब पांच वर्षों के बाद हम मिले थे.

“यार, बिज़नेस के सिलसिले में यहाँ आना हुआ है – कुमार सिगरेट सुलगाते हुए बोला. दो दिन यहाँ रुकना पड़ेगा शायद.”

मैं उसे पकड़ कर घर ले आया. दफ्तर से दो दिनों की छुट्टी ले ली. दो दिन बड़ी व्यस्तता में बीत गए. कुमार के आवभगत में मैंने कोई किफायत नहीं की.

कुमार को विदा  करने मैं उसके साथ स्टेशन गया. ट्रेन आने में कुछ देर थी. मैं कुमार के लिए एक पत्रिका लाने गया. लौटा तो देखा कि कुमार अपने किसी परिचित से हंस-हंस कर बातें कर रहा था. लौटते हुए उसने मुझे नहीं देखा था. कुछ दूर पर खड़ा होकर मैं पत्रिका उलटने लगा, तभी मेरे कानों में आवाज गूंजी, “अरे यार, मत पूछो, बड़ा शानदार मुल्ला फंसा था. दो दिनों तक गुलछर्रे उड़ाते रहे. खूब बेवकूफ .....” यह कुमार बोल रहा था.

  
ट्रेन प्लेटफार्म पर आ चुकी थी. जगह खोजकर मैंने कुमार को बिठाया. विदा लेने से पहले कहा, “ कुमार फिर आना, जरुर आना.”

कुमार खामोश रहा, हैरत से मुझे केवल देखता रहा वह. 

         और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

# लोकप्रिय  अखबार , 'हिन्दुस्तान' में 17 अप्रैल, 1997 को प्रकाशित