Tuesday, November 3, 2015

दाल पर बवाल की पड़ताल

                                                                                             - मिलन  सिन्हा
arharदाल पर बवाल जारी है. राजनीतिक विरोधियों द्वारा केंद्र सरकार से सवाल पर सवाल पूछे जा रहे हैं. विपक्ष राज्य सरकारों से जवाब तलब नहीं कर रहा है जैसे कि दाल प्रकरण में सारा दोष केंद्र सरकार का हो. जमीनी हकीकत को देखें तो दाल की कीमतें बढ़ी हुई हैं. निम्न और मध्यम आय वर्ग के लोगों के लिए ‘दाल-रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ’ वाली बात पर अमल करना भी मुश्किल हो रहा है. बिहार विधान सभा चुनाव में तो साम्प्रदायिकता, जंगलराज, आरक्षण, गौ मांस सेवन के साथ-साथ दाल भी एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है. कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों के छोटे-बड़े नेता खुले आम बयान दे रहे हैं कि खुदरा बाजार में दालें अब 200 रूपये प्रति किलो बिक रही हैं. मीडिया में भी दाल एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है. आखिर देश के गरीबों एवं आम जनों के लिए दाल ही तो प्रोटीन का सबसे सुलभ प्राकृतिक स्रोत रहा है. ऐसे में, दाल पर लगातार इतनी चर्चा के बीच दाल पर थोड़ी  गहराई से पड़ताल लाजिमी है. 

पहले दालों की कीमत के 200 रूपये प्रति किलो के पार जाने की सच्चाई को जानने की कोशिश करें. झारखण्ड की राजधानी रांची के एक बड़े खुदरा दुकान में चार-पांच दिन पहले  चना दाल 80 रूपये, मसूर 100 रुपये, मूंग 120 रुपये और अरहर दाल 190 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव बिक रहा था. जाहिर है कि केवल अरहर दाल 200 रूपये के आसपास थी, जब कि बाकी दालें 120 रूपये या उससे कम कीमत पर बिक रही थी. दालों की कीमतें अधिकतर प्रदेशों में कमोवेश इसी रेंज में थी. एक दर्जन से ज्यादा प्रदेशों में जमाखोरों तथा मुनाफाखोरों के खिलाफ हाल की करवाई के बाद तो खुदरा बाजार में दाल की कीमत में कमी आनी शुरू हो गई है. तो फिर नेतागण निरंतर चौथाई सच ही क्यों बोले जा रहे हैं ? क्या वाकई दाल में कुछ काला है ? दाल की कीमतें जल्द से जल्द नीचे आयें और बराबर नियन्त्रण में रहें, यह सबकी चाहत ही नहीं, मांग भी होनी चाहिए. लेकिन मात्र तथ्यहीन बयानबाजी से आम जन का कौन सा भला होने वाला है? आम जनता, खासकर बिहारी मतदाता के लिए यह विचारणीय सवाल है. 

कहना न होगा, देश में दलहन के पैदावार और दाल के खपत में अमूमन 40 लाख टन का अंतर रहता है, जिसे मुख्यतः आयात  से पूरा करने की कोशिश केन्द्र की हर सरकार करने का प्रयास करती है, बेशक उनके प्रयासों को लेकर सवाल किये जा सकते हैं. यह भी सच है कि देश में दलहन की पैदावार में लगातार कमी एक बड़ा मसला रहा ही है, लेकिन उससे कहीं बड़ा मुद्दा देश में दाल के उपलब्ध भण्डार को सही तरीके से वितरित करने का रहा है. मांग और आपूर्ति के सिद्धांत पर आधारित बाजार में हर बढ़ती मांग और हर घटती आपूर्ति के साथ मुनाफाखोरी और जमाखोरी का सीधा सम्बन्ध देखा गया है, जिसे प्रभावी प्रशासनिक सक्रियता से निबटा जा सकता है. दीगर बात है कि दालों की जमाखोरी एवं उससे संबंधित मुनाफाखोरी से निबटने की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है जिसे सभी सरकारों को आवश्यक वस्तु अधिनियम की धारा -7 के तहत अंजाम तक पहुंचाना होता है. ऐसे में सवाल उठना स्वभाविक है कि जब दाल की कीमतों में लगातार वृद्धि हो रही थी जिससे गरीबों की मुसीबतें बढ़ रही थी, तब भी राज्य सरकारें, जिसमें  भाजपा शाषित राज्य सरकारें भी शुमार हैं, ऐसी छापेमारी से क्यों बचती रही? केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली का तो कहना है कि केन्द्र सरकार के बारबार दबाव दिए जाने के बाद ही छापामारी का सिलसिला प्रारंभ हुआ. ज्ञातव्य है कि पिछले चार-पांच दिनों में  महाराष्ट्र, कर्नाटक, बिहार सहित कई राज्यों में मारे गए करीब 8400 छापों में जमाखोरों-मुनाफाखोरों  के पास से 82000 टन से ज्यादा दाल जब्त किये गए हैं. ऐसी छापामारी आगे भी जारी रहने की संभावना है. यहाँ आम जनता का यह सवाल मुनासिब है कि ऐसे छापे पहले क्यों नहीं मारे गए ; क्या राज्य सरकारें केन्द्र के पहल का इन्तजार कर रही थीं ?

आइये, अब जरा तीन प्रमुख दालों, अरहर, चना और मूंग में मौजूद गुणकारी तत्वों मसलन प्रोटीन, खनिज आदि के बारे में जान लें :  प्रति 100 ग्राम दाल की बात करें तो प्रोटीन का प्रतिशत अरहर में 22.3, चना में 20.8 तथा मूंग में 24.5% होता है, जब कि कैल्शियम की मात्र अरहर में 73 मिलीग्राम, चना में 56 मि.ग्रा और मूंग में 75 मिलीग्राम होता है. प्रति 100 ग्राम अरहर दाल में फास्फोरस के यह मात्रा 304, चना में 331 एवं मूंग में 405 मिलीग्राम होता है. कहा जाता है कि अरहर दाल की उत्पत्ति अफ्रीका से है और इस दाल की प्रकृति गर्म होती है, जबकि मूंग की उत्पत्ति भारत और चने की पश्चिम एशिया से मानी जाती है. तुलनात्मक रूप से मूंग की दाल में प्रोटीन सहित अन्य पोषक तत्व ज्यादा मात्रा में विद्दमान है. मूंग की दाल आसानी से पचने वाली होती है, जिसके कारण भी यह अक्सर बच्चों, वृद्धों और रोगियों को खिलाई जाती है. दाल के अलावे चने के सत्तू और वेसन के अनेकानेक लाभकारी उपयोग से तो हम सभी परिचित हैं ही.  

                 और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं  

 प्रवक्ता . कॉम पर प्रकाशितदिनांक :31.10.2015      

Monday, November 2, 2015

बिहार में एक नयी व बेहतर शुरुआत की आशा

                                            -मिलन सिन्हा 
कहते हैं, जब सत्य का साथ छूटता जाता है तथा जब तर्क चुकने लगते हैं, तब झूठे वादों और तथ्यहीन दावों को चीख -चीख कर दोहराना मजबूरी हो जाती है। आंकड़ों का खेल भी चल पड़ता है। सच तो यह है कि जब तक सार्वजनिक मंचों से झूठ को सच बताने का यह सिलसिला बंद नहीं होगा, तब तक सकारात्मक राजनीति को पुनर्स्थापित करना मुश्किल होगा .....

....एक तरफ तो हमारे नेतागण बार -बार कहते हैं कि जनता बहुत समझदार है , यह पब्लिक है सब जानती है, परन्तु वहीँ इसके उलट सच को  झूठ और झूठ को सच बताने और दिखाने की कोशिश करके क्या ये नेता आम लोगों को बेवकूफ समझने का प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर रहे हैं ?

....सोचनेवाली बात है जब आम जनता सब भली-भांति जान व समझ रही है तो उस पर विश्वास कर उसे विवेचना करने दीजिये, मीडिया कर्मियों, राजनीतिक विश्लेषकों को विश्लेषण करने दीजिये। आवश्यक हो तो प्रेस कांफ्रेंस आयोजित कर अपनी बात रखें और सार्थक सवाल-जवाब कर लें।

....सवाल तो उठना लाजिमी है कि क्या अपने विरोधी को नीचा दिखाकर, उनकी परछाईं से अपनी परछाईं को बड़ा दिखाकर विकासोन्मुख राजनीति के वर्तमान दौर में कोई भी दल बड़ी सियासी जंग जीत सकता है ? कहते हैं मुँह से निकली बोली और बंदूक से निकली गोली को वापस लौटाना मुमकिन नहीं होता। फिर बयान बहादुर का खिताब हासिल करने के बजाय आम जनता की भलाई के लिए सही अर्थों में एक भी छोटा कार्य करना नेता कहलाने के लिए क्या ज्यादा सार्थक नहीं है ?

...ऐसे भी राजनीतिक नेताओं को राजनीति से थोड़ा ऊपर उठ कर बिहार की अधिकांश आबादी जिसमें गरीब, दलित, शोषित -कुपोषित, अशिक्षित, बेरोजगार और बीमार लोग दशकों से शामिल हैं, की बुनियादी समस्याओं को समय बद्ध सीमा में सुलझाने का क्या कोई भगीरथ प्रयास नहीं करना चाहिए ?

.....आशा करनी चाहिए कि जल्द ही बिहार में एक नयी व बेहतर शुरुआत होगी, नयी सरकार जिस भी गठबंधन की बने !

(सन्दर्भ : बिहार विधानसभा चुनाव,2015)

                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Sunday, November 1, 2015

आखिर इतने कम मतदान प्रतिशत के क्या मायने हैं ?

                                                    -    मिलन  सिन्हा
बिहार के सभी दलों के नेता तथा  बिहार से बाहर बैठे अधिकांश समाज विज्ञानी व कुछ बड़े पत्रकार यह कहते रहे हैं कि बिहार के वोटर राजनीतिक रूप से बड़े परिपक्व हैं; उनकी सूझ-बूझ का कोई जोड़ नहीं, वे बेशक कम पढ़े-लिखे हो सकते हैं, पर हैं बहुत बुद्धिमान आदि,आदि. अगर ऐसा है तो फिर क्या कारण है कि इतने परिपक्व व समझदार आम बिहारी मतदाता मतदान के दिन मतदान केन्द्रों पर बड़ी संख्या में नहीं पहुँचते? पिछले तीन चरण के मतदान में वोट प्रतिशत 60 % (पहले चरण में 57%, दूसरे में 55%,  तीसरे में 53 % और चौथे चरण में करीब 58 % ) से भी नीचे क्यों रह गया ? क्या उनमें लोकतंत्र में चुनाव की महत्ता की समझ कम है या उनमें इसके प्रति जागरूकता का अभाव है या चुनावी राजनीति से उनका मोह्भंग हो रहा है या बिहार में राजनीतिक दल वोटरों को जाने-अनजाने कारणों से मतदान केन्द्रों तक लाने के लिए प्रोत्साहित करने में रूचि नहीं रखते हैं

कुछ तो गड़बड़ है, नहीं तो कोई कारण नहीं कि पिछले विधानसभा चुनाव,2010 में भी वोट का प्रतिशत मात्र 52.73 % रह जाय ! अर्थात 47.27% मतदाताओं ने किसी को भी अपना वोट नहीं दिया. इस तरह  लोकतंत्र कैसे मजबूत हो सकता है, क्यों कि 47.27% मतदाताओं की अपना विधायक चुनने में कोई भागीदारी ही नहीं रही.

क्या पिछले पांच वर्षों में प्रदेश की सरकार, केन्द्र की सरकार, प्रदेश के राजनीतिक दल व उनके छोटे- बड़े नेता और सबसे ऊपर निर्वाचन आयोग ने वोटिंग प्रतिशत को कम-से-कम 80% करने हेतु कोई गंभीर कदम उठाये, कोई नायाब पहल की ? अगर हाँ, तो उसका असर अब तक के तीन चरणों के मतदान में क्यों नहीं दिखा ? और अगर नहीं, तो क्यों ? फिर तो यह सवाल जायज है कि इस तरह के चुनाव की सार्थकता क्या है ?


एक और विचारणीय प्रश्न ! ज्ञातव्य है कि 2010 के चुनाव में बिहार विधान सभा के 243 सीटों के लिए 3523 प्रत्याशियों ने चुनाव लड़ा, जिसमें 3019 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गयी. जाहिर है कि  243 सीटों के लिए केवल 504 प्रत्याशियों को ही मतदाताओं ने गंभीरता से लिया. स्पष्टतः लगभग हर सीट पर सीधा मुकाबला था. क्या चुनाव आयोग ने इस बात का नोटिस लिया और इस चुनाव से पहले जमानत राशि में यथोचित वृद्धि करने सहित अन्य प्रभावी कदम उठाये जिससे विकास के लिए अपर्याप्त संसाधनों का रोना रोने वाले प्रदेश-देश में चुनावों को कम खर्चीला बनाया जा सके
(सन्दर्भ : बिहार विधानसभा चुनाव, 2015)

                  और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं