Sunday, November 23, 2014

मोटिवेशन : कस्टमर नहीं, ग्राहक

                                                        - मिलन सिन्हा 
clipदेश -विदेश के सर्विस सेक्टर अर्थात सेवा क्षेत्र में कार्यरत कंपनियों यथा, बैंक, इंश्योरेंस, रेलवे आदि का हमारे दैनंदिन जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। आपने भी इनके दफ्तरों में  लोगों को लम्बी -लम्बी कतारों में खड़े घंटों इंतजार करते देखा होगा। हमारे देश में तो ये दृश्य आम होते हैं। दफ़्तर खुलने का समय जो भी रहे, अमूमन वास्तविक कार्य घोषित समय के कम-से-कम पंद्रह -बीस मिनट बाद ही प्रारम्भ होता है, वह भी बिना कोई कैफियत दिये या खेद व्यक्त किये, जैसे कि देर से परिचालन शुरू करके उन्होंने कुछ गलत करने के बजाय लाइन में खड़े लोगों पर मेहरबानी की है। कई बार यह भी देखने में आता है कि लोगबाग लाइन में खड़े अपनी बारी का इंतजार करते हैं, लेकिन उनकी आँखों के सामने संबंधित स्टाफ आपस में गप्पें लड़ाने या किसी व्यक्तिगत काम में मशगूल रहते हैं। कतारों में चुपचाप खड़े कष्ट झेलने को अभिशप्त ऐसे लोगों को दफ़्तरवाले आम बोलचाल की भाषा में 'कस्टमर' कह कर सम्बोधित करते हैं। अर्थात कष्ट से जो मरे वह कस्टमर। यह नकारात्मक मानसिकता का परिचायक है जो किसी भी व्यवसाय के लिये बहुत नुकसानदेह है। इसके विपरीत अगर 'कस्टमर' के स्थान पर हिन्दी अर्थ 'ग्राहक' कहें और इस शब्द के निहितार्थ पर गौर करके कार्य करने लगें तो सर्विस सेक्टर के सभी कर्मियों के सोच और व्यवहार में गुणात्मक परिवर्तन आ सकता है, साथ में बिज़नेस में उछाल भी। कहने का अभिप्राय, ग्राहक वह जिसे ग्राह्य करने का हक़ है। देखिये, गांधी जी ने ग्राहक के महत्व को किस खूबसूरती से रेखांकित किया है: "हमारे परिसर में आनेवाला ग्राहक अति महत्वपूर्ण व्यक्ति है। वह हमारे ऊपर आश्रित नहीं है, हम उसपर आश्रित हैं। वह हमारे काम-काज के बीच बाधक नहीं है, वह इसका प्रयोजन है। वह हमारे व्यवसाय में कोई बाहरी व्यक्ति नहीं है, वह उसका एक अंग है। हम उसकी सेवा करके उस पर कोई कृपा नहीं कर रहे हैं, वह हमें ऐसा करने का सुअवसर प्रदान कर हम पर कृपा कर रहा है।" 

          और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं
# 'प्रभात खबर' के मेरे संडे कॉलम, 'गुड लाइफ' में प्रकाशित

Sunday, November 16, 2014

मोटिवेशन : नहीं करें चापलूसी

                                                            - मिलन सिन्हा 
clipप्रशंसा किसे अच्छी नहीं लगती - छोटे -बड़े , गरीब -अमीर, अपने -पराये सबको। कहते हैं आलोचना के लिये साहस की जरुरत नहीं होती है, पर प्रशंसा के लिये होती है। दीगर बात तो यह है कि सच्ची एवं समय पर प्रशंसा सबके बस की बात नहीं होती है। इसके लिये साफ़ दिल और खुले दिमाग के साथ -साथ आत्मिक बल की आवश्यकता होती है। इतना ही नहीं, प्रशंसा हमेशा सबके सामने करनी चाहिए जिससे उस व्यक्ति के साथ -साथ वहां उपस्थित लोगों को भी अच्छा लगे, प्रोत्साहन मिले । लेकिन क्या ऐसा होता है ? सामान्यतः हम देखते हैं कि लोग किसी को मात्र खुश करने के मकसद से उनकी तारीफ़ करते हैं जो थोड़े समय के बाद अंततः चापलूसी का रूप ले लेता है। ऐसा तब और भी स्पष्ट साफ़ हो जाता है जब हम किसी के अच्छे काम की तारीफ़ करने के बजाय उस व्यक्ति की यूँ ही तारीफ़ करने लगते हैं। जैसे कि आप जैसा दिलदार आदमी तो हमने अब तक नहीं देखा, आप इतने स्मार्ट कैसे हैं, आपके अंदाज तो वाकई बेमिसाल हैं आदि, आदि। राजनीति में ऐसी चापलूसी आम है। जाहिर है,ऐसा स्वार्थवश किया जाता है। हाँ, कई बार अच्छी मंशा से की जाने वाली प्रशंसा भी खुशामद प्रतीत होती है क्योंकि उस प्रक्रिया में अतिरेक का तत्व अनायास ही शामिल हो जाता है। लिहाजा किसी की तारीफ़ करते वक्त इस बात का ध्यान रखना चाहिए। 

दरअसल प्रशंसा सुनना आम आदमी की फितरत में शुमार है। और सही प्रशंसा तो किसी भी मनुष्य को और बेहतर कार्य करने  के लिये उत्प्रेरित करता है। देखिये, जो भी जब भी कोई अच्छा काम करे और उसे उसके लिये वाहवाही मिले, प्रशंसा मिले तो निश्चय ही वह और अच्छे काम करने को प्रेरित होगा जिसका सकारात्मक असर उसके परिवार के साथ -साथ पूरे समाज पर पड़ना लाजिमी है । कहना न होगा,  प्रशंसा जैसे सरल पर बेहद प्रभावी मनोवैज्ञानिक औजार से अच्छे काम करनेवालों की तादाद में अप्रत्याशित बढ़ोतरी करके किसी भी समाज और देश को बहुत मजबूत बनाया जा सकता है।

                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Friday, November 14, 2014

गरीब बच्चों के लिए बाल दिवस का क्या मतलब?

                                                                     -  मिलन सिन्हा

bal diwasफिर  बाल दिवस आ गया और चाचा नेहरु का जन्म दिवस भी ।  फिर अनेक  सरकारी- गैर सरकारी  आयोजन होंगे ।  स्कूलों में  पिछले वर्षों की भांति कई कार्यक्रमों का आयोजन होगा, ढेरों  बातें होंगी,  बच्चों की  भलाई के   लिए ढेर सारे वादे किये जायेंगे, तालियां बजेंगी, मीडिया में तमाम ख़बरें होंगी । इस साल ये सब कुछ थोड़ा ज्यादा और जुदा भी होगा क्यों कि बच्चों की बेहतरी के लिए समर्पित  दो शख्सियतों, सत्यार्थी व मलाला को नोबल शांति पुरस्कार जो मिला है । हां, आजाद  भारत  के पहले प्रधान मंत्री और बच्चों के चाचा नेहरू के जन्म दिन के उपलक्ष्य में भी अनेक कार्यक्रम आयोजित किये जायेंगे । बस और क्या ?

ज़रा सोचिये, इस मौके पर  पूरे  देश में  जितने रूपये सारे सरकारी - गैर सरकारी आयोजनों में खर्च होंगे तथा खर्च  हुए दिखाए जायेंगे, उतनी  भी राशि अगर कुछ गरीब, बेसहारा, कुपोषित बच्चों के भलाई के लिए  कुछ बेहद पिछड़े गांवों में   खर्च किये जाएं  तो बच्चों का कुछ तो भला होगा ।

आजादी के 67  साल बाद भी पूरी आजादी से गरीब छोटे बच्चे सिपाही जी को रेलवे के किसी स्टेशन पर या चलती ट्रेन में मुफ्त में गुटखा, सिगरेट,बीड़ी या तम्बाकू खिलाता,पिलाता दिख जायेगा। वैसे ही दिख जाएगा  नेताओं, मंत्रियों, अधिकारियों  के घर में भी  नौकर के रूप में काम करते हुए  लाचार,  बेवश  छोटे गरीब बच्चे। सड़क किनारे छोटे होटलों, ढाबों, अनेक छोटे-मोटे कारखानों, दुकानों आदि में ऐसे छोटे बच्चे सुबह से शाम तक हर तरह का काम करते मिल जायेंगे ।  यह सब देख कर ऐसा प्रतीत  होता है कि हमारे देश में जन्म से ही गरीब तबके के  बच्चों के साथ  लापरवाही या जैसे-तैसे पेश आने का प्रचलन  रहा हो ।


बहरहाल, इस मौके पर निम्नलिखित तथ्यों पर गौर करना प्रासंगिक होगा ।  बच्चों के अधिकार पर आयोजित संयुक्त राष्ट्र संघ अधिवेशन में पारित प्रस्ताव के अनुसार 18 वर्ष से कम आयु के लड़का और लड़की को बच्चों की श्रेणी में रखा जाता है ।  भारतवर्ष में बच्चों की कुल संख्या देश की आबादी का 40% है, यानी करीब 48 करोड़ ।  देश में हर घंटे 100 बच्चों की मृत्यु होती है ।  भारत में बाल मृत्यु  दर (प्रति 1000 बच्चों के जन्म पर ) अनेक राज्यों में 50 से ज्यादा है जब कि इसे 30 से नीचे लाने की आवश्यकता है ।  दुनिया के एक तिहाई  कुपोषित  बच्चे भारत में रहते हैं ।   देश में आधे से ज्यादा बच्चे कुपोषण के कारण  मरते हैं ।   पांच साल तक के बच्चों में 42% बच्चे कुपोषण के शिकार हैं ।  जो बच्चे स्कूल जाते है  उनमें  से 40% से ज्यादा बीच में ही स्कूल छोड़ देते हैं जब कि शिक्षा के अधिकार कानून के तहत उनके स्कूली शिक्षा के लिए सरकार को हर उपाय  करना है ।  हाल के वर्षों  में बच्चों के खिलाफ अपराध के मामलों में वृद्धि हुई है

 इस तरह  के अन्य अनेक तथ्यों से हम पढ़े-लिखे, खाते-पीते लोग रूबरू होते रहते है । वक्त मिले तो कभी -कभार थोड़ी चर्चा भी कर लेते हैं । लेकिन, अब  सरकार के साथ-साथ हमारे प्रबुद्ध तथा संपन्न समाज को भी इस विषय पर गंभीरता से सोचना पड़ेगा और संविधान/कानून  के मुताबिक  जल्द ही कुछ  प्रभावी कदम  उठाने पड़ेंगे, नहीं तो इन गरीब, शोषित, कुपोषित,अशिक्षित बच्चों की बढती आबादी आने वाले वर्षों  में देश के सामने बहुत  बड़ी और बहुआयामी चुनौती पेश करनेवाले हैं । ऐसे  भी, हम कब तक सिर्फ  सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी), शाइनिंग इंडिया, अच्छे दिन आने वाले हैं जैसे लुभावने जुमलों से देश की करोड़ों विपन्न लोगों और उनके नौनिहालों को छलते रहेंगे ।

                  और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

# प्रवक्ता.कॉम में प्रकाशित 

Monday, November 10, 2014

मोटिवेशन : जो करें, मन से करें

                                                   - मिलन सिन्हा
जो भी करना, मन लगा कर करना - मन लगाकर पढ़ना , मन लगाकर काम  करना  - इस तरह की नसीहत बचपन से लेकर बड़े होने तक, घर-स्कूल से लेकर ऑफिस तक बड़े -बुजुर्ग व वरिष्ठ अधिकारी -सहयोगी हमें हमारी बेहतरी के लिये देते रहे हैं। लेकिन क्या हमने कभी गंभीरता से इस सवाल पर विचार किया है कि काम करने और मन लगाकर काम करने में वाकई कोई बुनियादी फर्क है ? सच मानिए, छोटा -मोटा फर्क नहीं, जमीन -आसमान का फर्क है ! आखिर कैसे ? कुछ वैसे ही जैसे क्लास में शिक्षक पूरा चैप्टर पढ़ा गए और अंत में जब हमसे उन्होंने एक छोटा-सा प्रश्न पूछा तो हम उत्तर नहीं दे सके, जब कि अन्य कई सहपाठियों  ने न केवल उस सवाल का बल्कि उक्त  क्लास में पढ़ाये गए और कई सवालों का जवाब आसानी से दे दिया। ऐसा कैसे सम्भव हुआ ?  दरअसल, तन से तो हम वहां मौजूद थे और शिक्षक महोदय द्वारा पढ़ाये जाने वाले विषय के प्रति तन्मय भी दिख रहे थे, लेकिन क्या हमारा मन वहां था ? शर्तिया नहीं ! पढ़ने, काम करने आदि की बात छोड़ें, बहुत लोग तो क्या खा रहे हैं, कितना खा रहे हैं - उसकी बाबत पूछने पर  कि  क्या -क्या चीजें घंटे भर पहले खाईं, बताने में असमर्थ रहते हैं। किसी भी कार्य में बस यूँ  ही लगे रहने और मन से उसे करने में यही मूलभूत अंतर होता है। जब हम किसी काम को मन से करते हैं तो न केवल उसमें अपेक्षित रूचि लेते हैं, पूरी तन्मयता से उसे अंजाम देने  की भरपूर कोशिश करते हैं, बल्कि  उस काम को संपन्न  करने का पूरा आनंद भी महसूस करते हैं  इसके विपरीत जब हम उसी काम को बेमन से करते हैं, बोझ समझकर करते हैं तो उस कार्य की गुणवत्ता तो प्रभावित होती ही है, कार्य पूरा होने के बाद भी आनंद की अनुभूति नहीं होती है, सिर्फ यह लगता है कि सिर से बोझ उतर गया।  काबिलेगौर बात यह भी है कि मन से काम करने से हमारी कार्यक्षमता बढ़ती है, आत्मविश्वास में इजाफा होता है, समय का पूरा सदुपयोग होता है और साथ में उक्त कार्यक्षेत्र में हमारी एक अच्छी पहचान भी बनती है  

             और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Sunday, November 2, 2014

मोटिवेशन : दिखावा क्यों करें ?

                                                                    - मिलन सिन्हा
 अच्छा होना और अच्छा दिखना तो अच्छी बात है, परन्तु इसके विपरीत सिर्फ दिखावाआडम्बर आदि  से रुतबा बढ़ाने के बढ़ते चलन को क्या कहेंगे । एक नहीं अब तो कई एक  मुखौटे लगा कर चलनेवाले लोगों की कमी नहीं है । असली -नकली की पहचान मुश्किल हो रही है । नकली सामान से लेकर नकली चेहरे दिखाकर  बाजार में खूब खरीद-बिक्री हो रही है । मार्केटिंग की दुनिया का आम जुमला, 'जो दिखता हैवही बिकता हैका असर बाजारवाद के मौजूदा दौर में सब तरफ दिखाई पड़ रहा है । 

कहने का अभिप्राय यह कि दिखाने की ख्वाइश का जोर और दबदबा हर क्षेत्र में सिर चढ़ कर बोल रहा है ।  लेकिन इसका दिलचस्प पहलू यह है कि इस दिखने -दिखाने में छुपाने पर बहुत ध्यान दिया जाता है । बल्कि यूँ कहें तो छुपाना ही दिखाने की कला को सफल बनाने की पहली अहम शर्त बनती जा रही है तमाम तरह के फेयरनेस क्रीम व अन्य सौंदर्य प्रसाधनों से चेहरे आदि को रंगने की कवायद कुछ अलग दिखने -दिखाने की चाहत का एक मजबूत पक्ष  है । 

दिखाने में ही क्योंबोलने में भी यही प्रचलन है - मन में कुछ होता है लेकिन मंच से कुछ अलग ही बोलते हैं । फलतः जब  बोलते हैं तो विषयवस्तु पर फोकस नहीं कर पाते । दुःख की बात है कि  यह सब करते हुए हम अपनी  मौलिकता से दूर जाते रहते हैं और अंततः खुद से कट कर एक अजीब सी शख्सियत के मालिक बन बैठते हैं । 

क्या कभी हमने यह भी सोचा है कि दिखावा करने के चलते हमारे कितने धनसमय और ऊर्जा का अपव्यय होता है । सच पूछिये तो  खुद को छुपाने और जो हम नहीं हैंवह दिखाने की कोशिश हमें झूठ एवं फरेब के रास्ते पर ले जानेवाला  साबित होता हैजुर्म की अंधी गली में पहुंचने को उत्प्रेरित करता है

क्या गांधीलिंकनआइंस्टीनमदर टेरेसामंडेला सरीखे देश -दुनिया के बड़े व सम्माननीय लोग  सरलसादा और मौलिक जीवन जी कर लाखों -करोड़ों लोगों के लिये प्रेरक व अनुकरणीय नहीं बने ?  दरअसलदिखावे से बचना गुड लाइफ की एक अनिवार्य शर्त है । 

                              और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं