Sunday, August 31, 2014

अगले कुछ महीने तय करेंगे सूबे की सियासत

                                                                                         - मिलन सिन्हा 
loading...यदयपि वोटिंग प्रतिशत कम होने से सामन्यतः चुनाव  परिणाम के आकलन  व अनुमान गड्डमड्ड हो जाते  हैं, तथापि  बिहार विधानसभा की दस सीटों के लिए हुए उप चुनाव के परिणाम  अनुमान के अनुरूप हैं  क्यों कि ये उपचुनाव स्थानीय मुद्दों और जातीय आधार पर लड़े गए। ऐसे, उम्मीदवारों के व्यक्तिगत प्रभाव एवं दसों सीटों पर हार-जीत के पैटर्न में हुए उलट-पुलट के गहन विश्लेषण के पश्चात हम अनेक दिलचस्प तथ्यों से वाकिफ हो पायेंगे। 

 प्रत्याशा के अनुरूप  दोनों गठबंधन के नेता -प्रवक्ता दलगत आधार पर नतीजों की राजनीतिक व्याख्या कर रहे हैं। फिर भी, सिर्फ परिणामों के सन्दर्भ में कहें तो जहां यह  राजद -जदयू -कांग्रेस महागठबंधन के लिये  हर्ष व उत्साह का विषय है, वहीं भाजपा गठबंधन के लिये चिंतन और चुनौती का । सच तो यह है कि इस उपचुनाव  के जरिये लालू प्रसाद ने  'जो चाहा, वो पाया' का मुकाम हासिल कर लिया। महागठबंधन की राजनीति में आनेवाले दिन इसे साबित करेंगे। 

बहरहाल, अगले वर्ष जब विधान सभा के चुनाव होंगे तब भी परिणाम इसी उपचुनाव के ट्रेंड को दोहरायेंगे, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी ।  कारण करीब एक साल के इस अंतराल में बिहार की राजनीति में, खासकर राजद -जदयू -कांग्रेस महागठबंधन के सन्दर्भ में,   सब कुछ वैसा ही होगा जैसा आज हो रहा है, यह कोई नहीं कह सकता। वैसे भी संभावनाओं के इस अदभुत खेल में उपचुनावों के परिणाम न तो पूरे प्रदेश की जनता के मूड का बैरोमीटर होते हैं और न ही सुदूर भविष्य में होनेवाले विधानसभा या लोकसभा के चुनाव परिणाम के दिशा सूचक। 

भाजपा गठबंधन के लिये यह संतोष का विषय होना चाहिए है कि नरेन्द्र मोदी लहर के बिना, किन्तु तमाम  अंदरुनी  खींचतान   तथा  विपक्षी महागठबंधन में शामिल दलों के  मजबूत जातीय घेराबंदी के बावजूद उन्होंने चार सीटें हासिल कर ली। लेकिन, एक बात तो साफ़ है कि भाजपा गठबंधन के लिये मौजूदा  रणनीति की बुनियाद पर  अगला विधान सभा चुनाव जीतना काफी मुश्किल होगाजो उनका बड़ा लक्ष्य है। 

बिहार की  मौजूदा सरकार के पिछले 100 दिनों के कामकाज को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि अगर यही  सरकार अगले चुनाव तक काबिज रह जाती  है तो कानून व्यवस्था हो या विकास की गति, सरकार का स्कोर कार्ड शायद ही बेहतर  हो पाये। नतीजतन, इसका  नुकसान सत्तारूढ़ दल व महागठबंधन को उठाना पड़ेगा। यह  भाजपा गठबंधन के लिये बोनस होगा। फिर देखने वाली बात यह भी होगी कि अगले कुछेक महीनों में केन्द्र की मोदी सरकार किस तरह काम करती है।  अगर वह स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर दिए गए प्रधानमंत्री के भाषण के अनुरूप कार्य करके दिखा सकें, तो उन अच्छे कार्यों का राजनीतिक व चुनावी लाभ प्रदेश के भाजपा गठबंधन को मिलना स्वाभाविक है। दूसरी ओर अगर चारा घोटाला मामले में आने वाले दिनों में लालू प्रसाद को अदालती फैसलों से लाभ के बदले नुकसान होता है तो इसका दुष्प्रभाव राजद को झेलना पड़ेगा। 

कुल मिला कर आने वाले महीने तमाम राजनीतिक बयानबाजी, आरोप -प्रत्यारोप, आयाराम -गयाराम जैसे दृश्यों के गवाह होंगे। 

   और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं ।

# लोकप्रिय हिंदी दैनिक, 'दैनिक भास्कर' में  प्रकाशित दिनांक :26.08.2014

मोटिवेशन : संघर्ष से करें दोस्ती

                                                      - मिलन सिन्हा

हमें तो बचपन से अपने अभिभावकों, बड़े -बुजुर्गों -शिक्षकों  से यह सीख मिलती रही है कि अच्छा सोचोगे तो अच्छा करोगे और अच्छा बनोगे; तुम्हारे सोच एवं कर्म ही तुम्हारे जीवन की दशा -दिशा  निर्धारित करेंगे आदि, आदि । विश्व में सकारात्मक सोच की महत्ता को रेखांकित करने वाली कई किताबें बाजार में सहज उपलब्ध हैं जिनमें सकारात्मक सोच की शक्ति और उसके बहुआयामी फायदे के बाबत विस्तार से बताया गया है । हमारे बीच कितने ऐसे इंसान मिल जायेंगे जिन्होंने तमाम मुश्किलों का सामना करते हुए जीवन में सफलता पाई है और खुशियां भी । 

फिर क्यों 'आधा गिलास खाली' वाली नकारात्मक सोच से ग्रसित लोगों की संख्या में निरन्तर बढ़ोतरी हो रही है; जीवन से निराश होकर पलायनवादी रुख अख्तियार करनेवालों की तादाद दिन पर दिन क्यों बढ़ती जा रही है ? क्या हमारे जीवन में संघर्ष करने की क्षमता कम होती जा रही है या हम जल्द से जल्द सब कुछ पा लेने के दौड़ में असफल होने पर सीधे अवसाद ग्रस्त हो जाते है? सब जानते हैं कि सफलता-असफलता हमारे जीवन का हिस्सा है । फिर असफलता तो हमें आत्म निरीक्षण का अवसर प्रदान करती है, आत्म विश्लेषण को प्रेरित करती है ? 

आप भी मानेंगे, अगर हम संघर्ष के रास्ते जीवन में सुख और सकून पाने को लक्ष्य बना कर मजबूती से चल पड़ें तो कोई कारण नहीं कि हमें अपेक्षित सफलता न मिले ।  कहते हैं न कि ज्ञान, कौशल और नजरिया में से नजरिया सबसे अहम है, जीवन को सही मायने में सार्थक और जीवंत बनाने के लिये । जरा सोचिये, मई 1953 में माउंट एवेरेस्ट पर पहली बार  विजयी पताका लहराने वाले न्यूज़ीलैंड के महान पर्वतारोही एडमंड हिलेरी एवं उनके नेपाली साथी तेनजिंग नोरगे ने कितने मजबूत इरादों  व कठिन परिश्रम से वह सुखद कीर्तिमान बनाया होगा । 

    और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं ।

Sunday, August 24, 2014

मोटिवेशन : स्वच्छता का सवाल

                                                 - मिलन सिन्हा 
स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले के प्राचीर से राष्ट्र को सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने  अन्य अनेक विषयों के साथ स्वच्छता पर दो टूक बात कही और हर देशवासी से पूछा कि क्या हम खुद साफ़ सुथरा नहीं रह सकते, अपने आसपास तथा गली-मोहल्ले की सफाई सुनिश्चित नहीं कर सकते ? ऐसी ही बातें उन्होंने सांसद बनने के बाद अपने संसदीय क्षेत्र काशी पहुंचने पर वहां की जनता से पूछी थी । बात छोटी है, पर है बहुत ही महत्वपूर्ण एवं बहुआयामी । पटना या ऐसे ही किसी शहर के बाशिंदे गंदगी के दुष्प्रभाव से रूबरू होते रहते हैं, जहां दो तीन दिनों की बारिश के बाद शहर के अधिकांश इलाके पानी से भर जाते हैं व गंदे पानी की निकासी हफ़्तों तक नहीं हो पाती है, क्यों कि नाले पोलिथिन-थर्मोकोल या अन्य कचड़ों के कारण जाम हो जाते हैं; नाले या तो बने नहीं या ठीक से नहीं बने; नालों की नियमित सफाई नहीं होती; नगर निगम के अधिकारियों के साथ-साथ विधायक-सांसद तक  क्षेत्र की बुनियादी मसलों के प्रति कम संवेदनशील रहते हैं आदि आदि । ये सभी सवाल गैरवाजिब नहीं हैं, लेकिन बड़ा सवाल हमारी अपनी जिम्मेदारी को लेकर भी है । सड़कों पर कूड़ा -कचड़ा रोज कौन फेंकता है, सार्वजानिक स्थानों को कौन गन्दा करता है, नालों में पोलिथिन-थर्मोकोल आदि कैसे पहुंचता है, नगर निगम के मेयर व पार्षद को कौन चुनता है, आपदा प्रबंधन से जुड़ा हमारा प्रशासनिक तंत्र कब और किसके लिए काम करता है ? जाहिरा तौर पर हमें  इन प्रश्नों का जवाब  न केवल देना होगा, बल्कि स्वच्छता के मामले में कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लिए निजी तथा सामूहिक स्तर पर पहल करनी पड़ेगी । और इसकी शुरुआत हमसे होगी, हमारे घर से होगी, क्योंकि स्वच्छता में 'स्व' की भूमिका हमेशा से अहम रही है । राष्ट्रपिता महात्मा गांधी 'मनसा-वाचा-कर्मणा '  इसे साबित करते थे । 

                  और भी बातें करेंगे, चलते-चलतेअसीम शुभकामनाएं ।

Wednesday, August 20, 2014

बिहार का उपचुनाव : भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाना भाजपा के लिए भी मुश्किल

                                                                                           - मिलन सिन्हा 
 मुख्यतः जातीय समीकरण को ध्यान में रखकर लड़े जा रहे इस उपचुनाव में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद जब मंडल से कमंडल को परास्त करने की बात जोर -शोर से करते हैं, तो क्या यह मान लेना चाहिए कि भ्रष्टाचार, मंहगाई, विकास आदि की राजनीति को नेपथ्य में  रखने की कोई सोची-समझी रणनीति है ? वह भी तब जब खुद बिहार के मुख्यमंत्री ने कहा बताते हैं कि एक समय उन्हें भी बिजली बिल भुगतान के क्रम में रिश्वत का सहारा लेना पड़ा था और पूर्व मुख्यमंत्री ने भी माना है कि बिहार में पिछले कुछ वर्षों में तेज विकास  के साथ -साथ भ्रष्टाचार में भी इजाफा हुआ है। राजनीतिक प्रेक्षकों का यह कहना गैर मुनासिब नहीं है कि यदि  गठबंधन दल के रूप में भाजपा नीतीश सरकार के विकास का क्रेडिट लेना  चाहती है तो उस दौरान हुए भ्रष्टाचार में भी हिस्सेदारी की बात उसे करनी चाहिए। संभवतः यही कारण है कि दोनों गठबंधनों  में शामिल पार्टियां इसको उपचुनाव में बड़ा मुद्दा बनाने से बचना चाहती हैं।

 लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने भ्रष्टाचार को केन्द्र में रखकर सम्पूर्ण क्रांति का आन्दोलन चलाया जिसके परिणाम स्वरुप 1977 के आम चुनाव में केन्द्र की इंदिरा गांधी सरकार को पराजय का मुंह देखना पड़ा और केन्द्र सहित कई राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें सत्ता में आईं। यह इंदिरा गांधी ही थी जिन्होंने एक चर्चा के दौरान यह कहकर देश-विदेश में सनसनी फैला दी थी कि भ्रष्टाचार केवल देश में ही नहीं है, यह तो विश्वव्यापी है। बाद में अस्सी के दशक में जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने तो राजनीतिक गलियारे में उन्होंने यह कहकर तूफ़ान मचा दिया कि आम जनता की भलाई के लिए सरकार द्वारा खर्च किये जाने वाले प्रत्येक रुपये में से सिर्फ 15 पैसे ही उनके काम आता है। 

                    और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Tuesday, August 19, 2014

बिहार के उपचुनाव से अहम मुद्दे नदारत क्यों ?

                                                                             - मिलन सिन्हा 

biharelectionदो दिन बाद 21 अगस्त को बिहार विधान सभा के 10 सीटों के लिए उपचुनाव होंगे।  राजद -जदयू -कांग्रेस महागठबंधन के दो शीर्ष नेताओं, लालू प्रसाद यादव एवं नीतीश कुमार ने एक मंच से चुनाव प्रचार प्रारंभ करके चुनावी तापमान बढ़ाने का काम तो किया ही है, साथ-साथ महागठबंधन  में शामिल तीनों दलों के कार्यकर्ताओं को एकजुट होकर चुनाव में कार्य करने का सन्देश  देने की कोशिश भी की है। जाहिर है, अपने तरीके से ऐसा ही  प्रयास एनडीए गठबंधन के दल भी कर रहे हैं। बहरहाल, सोचने वाली बात यह है कि आम जनता से जुड़े अहम मुद्दे - भ्रष्टाचार, मंहगाई, गरीबी आदि बिहार के इस उपचुनाव में राजनीतिक बहस का विषय क्यों नहीं हैं ? क्या इन्हें जान बूझ कर चर्चा से अलग रखने की कोशिश हो रही है ? चलिए, भ्रष्टाचार जैसे एक बड़े मुद्दे पर आगे थोड़ी चर्चा करते हैं।

ज्ञातव्य है कि इंदिरा गांधी के पुत्र व राहुल गांधी के पिता स्व. राजीव गांधी  ने प्रधानमंत्री रहते हुए यह कहा था कि विकास के नाम पर खर्च होने वाले सरकारी पैसे का  85 % भ्रष्टाचार की  भेंट चढ़ जाता है।  विडम्बना देखिये , आगे उसी राजीव गांधी की सरकार को बोफोर्स तोप रिश्वत मामले के कारण सत्ता से बाहर जाना पड़ा। कहना न होगा, आजादी के 67 साल बाद भी  मेधा व प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न बिहार के पिछड़ेपन का एक बड़ा कारण राजनीतिक भ्रष्टाचार रहा है। बिहार के चारा घोटाला, अलकतरा घोटाला सहित अन्यान्य अनेक छोटे -बड़े घोटालों की चर्चा प्रदेश-देश से लेकर विदेश की मीडिया में होती रही है । क्या राजनीतिक संकल्प से इस शर्मनाक स्थिति को नहीं बदला जा सकता है ?

गौर तलब है कि पिछले लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने मंहगाई के साथ-साथ  भ्रष्टाचार को मुख्य मुद्दा बनाकर चुनाव प्रचार किया और अभूतपूर्व सफलता पाकर दस साल से  केन्द्र में काबिज यूपीए सरकार के स्थान पर सत्तारूढ़ हुई। स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में इस बात को सकारात्मक रूप से उठाया है और इस मुद्दे पर गंभीरता से आगे बढ़ने का स्पष्ट संकेत दिया है। फिर सवाल है कि इतना सब कुछ जानने समझने के बाद भी बिहार के वोटरों, खासकर युवाओं  के लिये भ्रष्टाचार क्या कोई चुनावी मुद्दा नहीं है ? क्या बिहार की आम जनता रोजमर्रा जिन्दगी में भ्रष्टाचार की इतनी आदी हो चुकी  है कि उनके लिए अब यह चर्चा का विषय नहीं रह गया है ? या कि वे इस राजनीतिक माहौल से ऊब चुके हैं , निराश हो चुके हैं ?

ऐसा मानना सही नहीं होगा। उम्मीद है बिहार के वोटर आगे होनेवाले सभी चुनावों में सबको इसका माकूल जबाव देंगे।  

                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Sunday, August 17, 2014

मोटिवेशन : बच्चों और युवाओं को खेलने दें

                                               - मिलन सिन्हा 
अभी -अभी स्कॉटलैंड के ग्लास्गो 20 वें राष्ट्र मंडल खेलों का समापन हुआ जिसमें हमारे देश के खिलाड़ियों ने विभिन्न  खेलों  में 15 स्वर्ण पदक सहित कुल 64 पदक प्राप्त कर मेडल तालिका में पांचवा स्थान हासिल किया, जब कि इंग्लैंड, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और स्कॉटलैंड क्रमशः पहले, दूसरे, तीसरे  और चौथे स्थान पर रहे । संसद के दोनों सदनों में खिलाड़ियों के प्रदर्शन की सराहना की गयी । 2010 के दिल्ली कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत 101 पदक के साथ दूसरे स्थान पर था । जनसंख्या के लिहाज से पदक तालिका में पहले चार स्थान पर रहे देशों की कुल आबादी हमसे 110 करोड़ कम है, लेकिन पदकों की संख्या हमसे  करीब सात गुनी ज्यादा । यह विश्व के सबसे बड़े युवा आबादीवाले हमारे देश के लिए विचारणीय विषय है । ऐसा इसलिए भी जरूरी है कि देश के मात्र दस फीसदी प्राथमिक स्कूलों में बच्चों के लिए खेल का मैदान है। ऐसा तब जब हम सभी जानते हैं कि खेलकूद का हमारे बच्चों और युवाओं के सर्वांगीण विकास में कितना सकारात्मक योगदान रहता है।योजना,कार्यन्वयन,समय प्रबंधन,टीम वर्क जैसे अहम नेतृत्व क्षमताओं को विकसित करने का अवसर खेल के मैदान में अनायास ही मिल जाता है । बच्चों को सामजिक, नैतिक, बौद्धिक और भावनात्मक रूप से मजबूत एवं परिपक्व बनाने में इसका कोई जोड़ नहीं । संसार के प्रसिद्ध खिलाड़ियों ने इस बात को सार्वजनिक रूप से रेखांकित किया है । देखिये न, पटना में चल रहे पहली प्रो -कबड्डी लीग मैच  के  प्रति खिलाड़ियों के साथ -साथ दर्शकों और खेल प्रेमियों में  कितना उत्साह और उमंग है । हमारे गांव-देहात,टोले-मोहल्ले के करोड़ों बच्चों एवं युवाओं के बीच लोकप्रिय ऐसे शुद्ध देशी व कम खर्चीले खेलों का आयोजन खेलकूद से जुड़े रहने की हमारी नैसर्गिक इच्छा का ही तो द्योतक है । 

                  और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Tuesday, August 12, 2014

मोटिवेशन : चलते रहेंगे, तो चलते रहेंगे !

                                                                                    - मिलन सिन्हा 
स्वास्थ्य पर एक परिचर्चा के दौरान अनायास ही कह दिया था -चलते रहेंगे तो चलते रहेंगे ! फिर गहराई में जाकर सोचा तो पता चला कि इस छोटे से वाक्य में कई तरह के अर्थ छुपे हैं। मनोज कुमार अभिनीत मशहूर हिन्दी फिल्म, 'शोर' का यह गाना याद है न -'जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबह-शाम......'चलना ऐसे है तो एक सामान्य शारीरिक क्रिया, पर इसके परिणाम अत्यन्त ही बहुआयामी व दूरगामी होते हैं। अपने जीवन की घड़ी को थोड़ा पीछे मोड़ कर देखिये -याद कीजिये उस पल को जब आपने अपने बच्चे को पहली बार अपने पैरों पर चलते हुए देखा था। न केवल आपके व आपके परिवार के लिए वह एक अदभुत अनुभूति थी, बल्कि उस बच्चे के लिए भी कुछ नया करने व पाने का गौरवशाली पल था । मनुष्य जीवन का विकास  चलने -करने -सीखने -पाने -खोने के बीच से ही तो गुजरते हुए आगे बढ़ता रहा है । 

सच पूछिये तो टहलना -चलना एक लोकतान्त्रिक सोच है, एक समावेशी  दर्शन है, एक सम्पूर्ण विकास यात्रा है । गौतम बुद्ध, स्वामी विवेकानंद,  महात्मा  गांधी, विनोबा भावे जैसे कितने ही महान व्यक्ति इसका ज्वलंत उदाहरण हैं । सुबह टहलने के फायदे एकाधिक हैं। आजकल तो डॉक्टर, खासकर ह्रदय रोग विशेषज्ञ, मधुमेह रोग विशेषज्ञ आदि अपने-अपने मरीजों को रोज सुबह कम से कम आधा घंटा टहलने की सलाह जरूर देते हैं । विशेषज्ञ कहते है कि टहलने से सेरोटोनिन व एंडोर्फिन नामक फील -गुड व फील -हैप्पी  हॉर्मोन का स्राव हमारे शरीर में होता है जो हमें मानसिक रूप से प्रसन्न रखता है। ऐसे भी गाड़ियों के गड़गड़ाहट व बेवजह हॉर्न से कमोवेश मुक्त; चिडियों की चहचहाट; पेड़ -पौधों से हवा के वार्तालाप की सनसनाहट; साथ चलते लोगों के बीच संबंधों की गर्माहट भरे परिवेश में किसे आनंद की अनुभूति नहीं होगी ?

                     और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

'प्रभात खबर' के मेरे संडे कॉलम, 'गुड लाइफ' में प्रकाशित

राजनीति तो है ही संभावनाओं का खेल

                                                                                         - मिलन सिन्हा 
Displaying 11978735-0.jpgराजनीतिक कारणों से दलों का मिलना, उनके बीच चुनावी गठबंधन होना कोई नई बात नहीं होती है। बेशक दलों के नेताओं का  दिल से  मिलना चुनाव में ज्यादा असरकारी होता रहा है। बहरहाल, हम सभी जानते हैं कि  राजनीति संभावनाओं का खेल है। ऐसे में, मुख्य मंत्री जीतन राम मांझी ने अगले वर्ष होनेवाले विधान सभा चुनाव के बाद बहुमत मिलने पर नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने की बात कह भी दी तो सियासी भूचाल क्यों आ गया ?  जदयू में सबसे पावरफुल नेता तो वे  हैं ही। सच तो यह है कि जदयू में नीतीश से बड़ा नेता कोई नहीं। समझनेवाली बात है कि जिस दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष को मधेपुरा से लोकसभा चुनाव हारने के बाद नीतीश के बदौलत राज्यसभा में दाखिल होना पड़े, उस दल में अन्य नेताओं के राजनीतिक  प्रभाव का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। वह भी तब जब कि जदयू के अधिकांश बड़े नेता की छवि  चुनाव जीताउ वाली नहीं है। 

ऐसे भी विधान सभा चुनाव में देर है और संभावनाओं के खेल में  कब क्या हो जाय, कहना मुश्किल होता है। फिलहाल तो अपनी प्रथम प्राथमिकता के अनुरूप जदयू अपनी सरकार को  अगले चुनाव तक  बचाये रख सके, वही पार्टी नेतृत्व के लिये बड़ी उपलब्धि होगी। उल्लेखनीय है कि आने वाले कुछेक महीनों में बिहार की राजनीति में कमजोर जनाधार वाली कांग्रेस पार्टी के लिये खोने को कुछ नहीं है, वह भी तब जब लोकसभा चुनाव के बाद उसका  केंद्रीय नेतृत्व ही अवसादग्रस्त दिख रहा  है। कांग्रेस पार्टी अपने खोये जनाधार को थोड़ा समेट सके और विधान सभा में अपने विधायकों की  संख्या बढ़ा सके, वही उसकी कोशिश भी होगी एवं अन्तिम तात्कालिक लक्ष्य भी। हाँ, निश्चय ही अगला एक साल राजद नेतृत्व के लिये 'करो या मारो' वाला समय होगा। आसन्न उप चुनाव को वह इसी नजरिए  से देख रहा है, क्यों कि इसके फलाफल पर राजद  महागठबंधन का नेतृत्व करने की अपनी मंशा को पूरा कर पायेगी और अगले विधान सभा चुनाव में बड़ा रोल अदा करने का दावा कर  सकेगी। दरअसल, लालू प्रसाद के लिए अपने परिवार को केन्द्र में रखकर सत्ता की राजनीति में लौटने का यह  माकूल व बड़ा मौका है जिसे वे किसी भी हालत में भुनाना चाहेंगे जिससे खुद नहीं तो फिर अपने परिवार से ही किसी को  मुख्य मंत्री पद पर काबिज कर सकें।

जहाँ तक प्रदेश में एनडीए में शामिल सबसे बड़े दल भाजपा का सवाल है, वहां भी मुख्य मंत्री पद के कई दावेदार हैं जो प्रत्यक्ष -अप्रत्यक्ष रूप से अपनी -अपनी मंशा का इजहार करते रहे हैं। कई राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि  अगर भावी मुख्य मंत्री के तौर पर  सुशील मोदी को प्रस्तुत किया जाता है तो यह  बिहार के जटिल सोशल इंजीनियरिंग की दृष्टि से मुनासिब लगता है। मुख्य मंत्री पद के लिये संभावित अन्य भाजपा नेताओं की बात करें तो नन्द किशोर यादव, रवि शंकर प्रसाद  तथा शाह नवाज हुसैन उपयुक्त लगते हैं। 

हालांकि, मौजूदा वक्त भाजपा के प्रादेशिक नेतृत्व के लिये भी  मोदी लहर से इतर अपने अन्तर्कलहों से निबटने, खुद को  तराशने की गंभीर चुनौती लेकर आया है। देखना होगा कि  इन चुनौतियों से पार पाते हुए यह पार्टी  2015 के विधानसभा चुनाव  में मुख्यमंत्री के रूप में एक सर्वमान्य चेहरे को सामने रखकर  खुद को एक समर्थ विकल्प के रूप में किस तरह जनता के सामने  प्रस्तुत  कर पाती है।

                    और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Tuesday, August 5, 2014

दिलचस्प होगी आगे की राजनीति

                                                                                                   -मिलन सिन्हा                 
Displaying 11870939-0.jpgप्रदेश में आगामी 21 अगस्त को विधान सभा की दस सीटों के लिए हो रहे उपचुनाव में अब भाजपा -लोजपा गठबंधन और जदयू-राजद-कांग्रेस महागठबंधन  के बीच मुख्य मुकाबला है। दोनों ही गठबंधन वैचारिक चोला उतार कर स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियों के  मद्देनजर चुनाव जीतने भर के उद्देश्य से मैदान में हैं। इसमें सिद्धान्त आदि की चर्चा  जो भी नेता कर रहे हैं, उसके पीछे उनकी अपनी अपनी राजनीतिक बाध्यता  है। सच वही  है जो  गरीबों -दलितों-अल्पसंख्यकों के लिए जीने -मरने की कसम खाने वाले जदयू, राजद और कांग्रेस तीनों दलों के प्रादेशिक अध्यक्षों ने  संवाददाता सम्मलेन में कहा - वोटों के बिखराव को रोकने के लिए जदयू, राजद और कांग्रेस का साथ आना समय की मांग है।  मजेदार बात यह है कि एक तरफ महागठबंधन में शामिल तीनों दलों के बड़े -छोटे सभी नेता कह रहे  हैं कि इससे  बिहार से एक नए राजनीतिक अभियान की शुरूआत हो गई है जिसका  विस्तार अखिल भारतीय स्तर पर अन्य सामान विचारधारा वाले दलों के साथ मिलकर किया जाएगा। लेकिन  इस सवाल का उत्तर कोई नहीं  दे रहा है कि किस मजबूरी में इन तीनों पार्टियों के बड़े  नेता, शरद -नीतीश, लालू प्रसाद एवं सोनिया गांधी -राहुल गांधी एक मंच से ऐसा बयान देने से कतरा रहे हैं ? क्या वे इस महागठबंधन की सफलता के प्रति आश्वस्त नहीं हैं और इस ट्रेलर का अंजाम देखकर ही आगे की रणनीति तय करेंगे ?  

दोनों गढ़बंधनों में शामिल दलों द्वारा घोषित उम्मीदवारों के  राजनीतिक सफर  पर नजर डालने मात्र से यह बात साफ़ हो जाती है कि इस चुनाव में सीट विशेष के जातीय अंकगणित को आधार बनाकर उम्मीदवारों का चयन किया गया  है। तथ्य यह भी है कि  दलों के पास चुनाव जीताऊ जमीनी नेताओं की कमी है जिसे दूसरे दलों में सेंधमारी कर पूरा करने की कोशिश की गयी है।  मसलन, टिकट बंटवारे में एनडीए ने जिन दो महिलाओं को उम्‍मीदवार बनाया है,  वे  दोनों टिकट की घोषणा होने से पहले तक  दूसरी पार्टियों में थीं। निःसंदेह, यह समर्पित कार्यकर्ताओं को हतोत्साहित करने वाली बात है जिसका विरोध यहाँ वहाँ हो भी रहा है।उपचुनाव के नतीजों पर इसका असर भी कहीं -कहीं दिखेगा जरूर। इसे भविष्य में राजनीतिक समीकरण के सम्भावित स्वरुप का एक बानगी माना जा सकता है।

उपचुनाव के परिणाम पर कयास लगाने की चेष्टा करें तो यह मानना पड़ेगा कि स्थानीय मुद्दों पर लड़े जाने वाले  इस चुनाव में जदयू-राजद-कांग्रेस  महागठबंधन में से सबसे ज्यादा फायदा राजद और कांग्रेस को होगा।  बशर्ते  वे  मन से एकजुटता का प्रदर्शन करते हुए अपने -अपने कार्यकर्ताओं को महागठबंधन की सफलता के लिए प्रेरित कर सकें।  क्यों कि कार्यकर्ताओं में असमंजस और भ्रम की स्थिति तो है ही। जो  भी हो, उम्मीद तो  है कि बिहार की उथल-पुथल भरी मौजूदा  राजनीति की आगे की यात्रा दिलचस्प होगी। 

                     और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Sunday, August 3, 2014

मोटिवेशन : आपकी मुस्कान, आपकी पहचान

                                                             - मिलन सिन्हा         
मुस्कराहट आपके चेहरे की खूबसूरती बढ़ाता है- दन्त चिकित्सक के क्लीनिक सहित कई स्थानों पर आपने भी यह देखा-पढ़ा होगा। स्टूडियो में फोटो खींचने से पहले आपने फोटोग्राफर को अनिवार्य रूप से यह कहते हुए सुना होगा - स्माइल प्लीज। चेहरे पर मुस्कान लिये हमारा अभिवादन करते कर्मियों से हम होटल से लेकर हवाई जहाज तक रूबरू होते रहते हैं।सच है, जैसे मुरझाये  हुए पेड़ -पौधे अच्छे नहीं लगते, वैसे ही मुरझाये हुए चेहरे। निःसंदेह, मुस्कराहट हमारे चेहरे पर एक ऐसा मैजिक बैंड है जो दूसरों को दोस्ती और भाईचारे का पैगाम देता  है। किसी भी वार्तालाप के सफल समापन में इसकी अहम भूमिका को सभी स्वीकारते हैं। कहते हैं, ईश्वर ने केवल  मानव जाति को यह  नायाब तोहफा दिया है। लेकिन क्या हम सभी इस अनमोल तोहफे का उपयोग एवं उपभोग अपने जीवन को बेहतर और खुशहाल बनाने के लिए कर पा रहे हैं ? 

विशषज्ञों के इस राय से कौन इंकार कर सकता कि हमारे चेहरे पर तैरते स्वाभाविक मुस्कान हमारे अन्दर व्याप्त ऊर्जा एवं उत्साह का परिचायक होता है।यह भी सही है कि मुस्करानेवाले लोग अपेक्षाकृत कम तनावग्रस्त रहते हैं। लिहाजा, इस  बात पर जोर देने की आवश्यकता नहीं है कि हंसना-मुस्कराना स्वास्थ्य को बेहतर बनाये रखने में सहायक होता है। अनेक लोग इसे एक मुफ्त तथापि बेहद प्रभावी प्राकृतिक औषधि की संज्ञा देते हैं, कारण वे जानते हैं कि मुस्कराने की इस सम्पूर्ण प्रक्रिया में हमारे शरीर में फील -गुड व फील -हैप्पी  हॉर्मोन का स्राव  होता है जो हमें मानसिक रूप से प्रसन्न रखता है।ज्ञातव्य है कि गांधीजी तथा मदर टेरेसा  सहित देश-विदेश के अनेक महान लोग  न केवल इसकी अमूल्यता  के प्रशंसक रहे हैं, बल्कि अपने दैनंदिन व्यवहार में इसे अमल में लाकर इसका औचित्य भी सिद्ध करते रहे हैं।  

                      और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Friday, August 1, 2014

बेरोजगार युवाओं के लिए 'स्किल्ड इंडिया' के मायने

                                                                       -मिलन सिन्हा 
The Power of Youthविश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में चुनाव के बाद 16वीं लोक सभा का गठन मई में ही हो चुका है। देश के युवाओं ने, जिसमें पहली बार वोटर बनने वाले लाखों युवा भी शामिल है, बड़ी संख्या में वोट करके मोदी जी के नेतृत्व में गैर-कांग्रेसी एनडीए सरकार को केन्द्र में सत्तारूढ़ कर दिया है। इस बीच आम बजट और रेल बजट भी आ गया। अनेक घोषणाएं हुई, अनेक वादे भी किये गए। संसद के दोनों सदनों में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बहस का उत्तर देते हुए प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी आशा के अनुरूप गरीबों और महिलाओं के साथ -साथ युवाओं के कल्याण के लिए सरकार की प्राथमिकता को रेखांकित किया।

अपनी चर्चा को युवाओं तक सीमित रखें तो प्रधानमंत्री का नजरिया बिल्कुल सही प्रतीत होता है।  हमारा देश विश्व का सबसे युवा देश जो है। भारत दुनिया का ऐसा देश है, जहां युवाओं की संख्या सबसे अधिक है। 2011 के जनगणना के अनुसार 15 से 29 वर्ष के आयु वर्ग के युवाओं के संख्या 33 करोड़ है जो देश के कुल आबादी का 27.5 % है।

कहना न होगा, किसी देश का भविष्य तभी बेहतर हो सकता है जब उस देश के युवाओं को बेहतर शिक्षा, ज्ञान , कौशल आदि  के आधार पर सहज व उपयुक्त  रोजगार उपलब्ध हों। लेकिन क्या हम अपने युवाओं के लिए ऐसा करना चाहते हैं और वाकई कर भी रहे हैं? गौरतलब है कि जहां भारत में दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी रहती है, वहीँ यह भी एक कड़वा सच  है कि दुनिया में सबसे अधिक बेरोजगार युवा भी हमारे देश में हैं। इससे भी अधिक चिंताजनक विषय यह है कि युवाओं में जैसे-जैसे शिक्षा का स्तर बढ़ रहा है, वैसे- वैसे ही बेरोजगारी की दर भी बढ़ रही है। उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे बड़े एवं राजनीतिक रूप से ज्यादा संवेदनशील, लेकिन औद्योगिक रूप से पिछड़ते जा रहे राज्यों में यह स्थिति और भी गंभीर है।

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन द्वारा वर्ष 2009-10 के आंकड़ों के आधार पर जारी रपट के मुताबिक ग्रामीण क्षेत्र के स्नातक डिग्रीधारी लड़कों  में बेरोजगारी दर 16.6 % और लड़कियों में 30.4 % रही। शहरी क्षेत्रों के ऐसे युवकों में यह  दर 13.8 % और युवतियों में 24.7 % दर्ज की गई। सेकेंडरी लेवल के सर्टिफिकेट धारक  ग्रामीण इलाके के युवकों में बेरोजगारी दर 5 % और लड़कियों  में करीब 7 %   रही जब कि शहरी क्षेत्रों के युवकों में बेरोजगारी दर 5.9 % और महिलाओं में 20.5 % पाई गई। गत तीन वर्षों में इस स्थिति में सुधार के बजाय गिरावट ही हुई  है।

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के हाल के रपट ने देश के नौकरी बाजार की स्थिति को कमजोर बताया है।  उक्त रपट में पिछले दो साल में बेरोजगारों की संख्या में वृद्धि के बात कही गयी है जो जमीनी हकीकत से मेल खाते हैं। यह तो हमें मालूम ही है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में वर्ष 2004 -09 के दौरान औसतन 9 % जीडीपी ( सकल घरेलू उत्पाद ) ग्रोथ दर था जो कि विश्व के कई उन्नतशील देशों से बेहतर था, लेकिन इस अवधि में केवल दस लाख नौकरियां ही सृजित की जा सकी जो बेरोजगारों के विशाल फ़ौज के सामने बहुत ही नगण्य  है। हाल ही में समाप्त हुए  यू पी ए -II  के  कार्यकाल के पांच वर्षों में नौकरियां और भी कम सृजित हुई, जब कि इसी दौरान इंजीनिरिंग  व मैनेजमेंट का  डिग्री हासिल करने वाले युवाओं की  संख्या बेतहाशा बढ़ी।

विडंबना यह है कि तकनीकी शिक्षा क्षेत्र में भी बेरोजगारी दर में बेतहाशा वृद्धि हो रही है। इससे इस धारणा को बल मिलना स्वाभाविक है कि युवाओं के लिए चलाए जा रहे स्किल डेवलमेंट मिशन के प्रयास भी रोजगार गारंटी का सर्टिफिकेट नहीं बन पा रहे   हैं। तो सवाल है कि आखिर कोरी घोषणाओं से ज्यादा  क्या अर्थ है इनका हमारी युवा पीढ़ी के लिए, जबतक रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं उपलब्ध होते ? इस परिस्थिति में बड़ी संख्या में नौकरी व रोजगार सृजन करने हेतु मोदी सरकार के पहले बजट में जो दिशा संकेत दिये गये हैं, उससे संबंधित अबिलम्व एक ठोस समयबद्ध कार्ययोजना बनाये बगैर और उसपर पूरी निष्ठा व प्रतिबद्धता से अमल सुनिश्चित किये बिना क्या इस देश को  स्कैम इंडिया से स्किल्ड इंडिया में तब्दील करना संभव व सार्थक हो पायेगा, जैसा कि मोदी जी का लक्ष्य है और करोड़ों बेरोजगार युवाओं को उम्मीद ?
                   और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं
प्रवक्ता . कॉम पर प्रकाशित