Sunday, December 28, 2014

गुड लाइफ : सीखने का संकल्प

                                                     - मिलन सिन्हा 
clipसीखने की न तो  कोई उम्र होती है और न ही इसका कोई समय। सीखना एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है। और इसके फायदे भी अनेक हैं।  'लर्न मोर टू अर्न मोर' वाली प्रबंधनीय उक्ति आपने भी सुनी होगी। अपने भविष्य को सजाने, संवारने और सुखमय बनाने को उद्दत अनेक विद्यार्थी इस सिद्धांत पर चलते हुए एक साथ एकाधिक कोर्स पूरा करने में लगे रहते हैं। जैसे घड़ी की सुई और  समुद्र की लहरें किसी का इंतजार नहीं करती हैं  और अपने काम में लगी रहती हैं, वैसे ही सीखने को आतुर लोग हर पल का  सदुपयोग करने में लगे रहते हैं । कहते हैं चीन के महान नेता माओ-से-तुंग  ने सत्तर साल की उम्र में अंग्रेजी भाषा सीखना प्रारम्भ किया। विश्व की सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय चित्र के रूप में 'मोनालिसा' का नाम लिया जाता है जिसे प्रख्यात चित्रकार लियोनार्दो दि विंची ने बनाया था। इटली के फ्लोरेंस शहर में जन्मे इस विलक्षण व्यक्ति ने अपनी सीखने की  ललक के कारण चित्रकला के अलावे मूर्तिकला, गणित, सैन्य विज्ञान, संगीत आदि में भी महारत हासिल की। इतिहासकार  कहते हैं कि चित्रकला और मूर्तिकला में निपुणता अर्जित करने  लिए वे इस कदर मशरूफ थे कि उन्होंने  शरीर विज्ञान तक का गहन  अध्ययन किया। कहां संगीत, कहां गणित और कहां चित्रकला-मूर्तिकला, लेकिन लियोनार्दो ने हर क्षेत्र में गहरी पैठ बनाई और यह साबित कर दिया कि सीखने का संकल्प हो तो कुछ भी हासिल किया जा सकता है। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर  में भी सीखने की अद्भुत उत्कंठा थी जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने साहित्य के लगभग सभी विधाओं- कविता, कहानी, नाटक, गीत आदि  में  बहुत लिखा और बहुत उत्कृष्ट लिखा। उनके गीत संग्रह 'गीतांजलि'  के लिए उन्हें 1913 में साहित्य के नोबेल पुरस्कार  से सम्मानित किया गया था। गुरुदेव पहले भारतीय थे जिन्हें इस सर्वोच्च सम्मान से नवाजा गया। तो आइये, हम सब नववर्ष 2015 का स्वागत कुछ नया और अच्छा सीखने के संकल्प के साथ करें।

                  और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 

Saturday, December 20, 2014

गुड लाइफ : हम सभी अपनी जीवनशैली सुधारें

                                                                                           - मिलन सिन्हा 
clipदेश की आबादी निरन्तर बढ़ रही है और साथ ही लोगों की स्वास्थ्य सम्बन्धी जरूरतें और समस्याएं। सरकारें व संबंधित एजेंसियां अपना -अपना काम अपने ढंग व रफ़्तार से करने में जुटीं हैं, तथापि रोगों की संख्या और उससे पीड़ित लोगों की तादाद में इजाफा हो रहा है, जो सबके लिये गंभीर चिंता का विषय है। क्या देश की मौजूदा स्वास्थ्य व्यवस्था इस समस्या से प्रभावी रूप से निबट सकती है ? 

देश के जिन करोड़ों लोगों को अभी तक रोटी, कपड़ा, मकान जैसे मूलभूत आवश्यकताओं से जूझना पड़ रहा है, उनकी चर्चा यहाँ  न भी करें  तो भी यह जानना दिलचस्प होगा कि  जिन लोगों के पास खाने, पहनने और रहने की कोई समस्या नहीं है, ऐसे लोग भी कैसी -कैसी  बिमारियों के शिकार हैं और इनकी  संख्या बढ़ती जा रही है। 

ऐसे लोग खाने -पीने के मामले में सुबह से रात तक कितने -कितने और कैसे -कैसे अच्छे -बुरे विज्ञापन देखते रहते हैं और बिना ज्यादा सोचे -समझे विज्ञापित चीजों का सेवन करके अपना स्वास्थ्य खराब करते रहते हैं। अगर इन लोगों से  कुछ आसान से सवाल पूछे जायें  तो कितने लोग संतोषप्रद उत्तर दे पायेंगे। सवाल हैं : क्या आप जानते हैं कि 1) कब, कैसे और कितना पानी पीना चाहिए  2) कब, कितना और क्या -क्या खाना चाहिए 3) स्वस्थ जीवन के लिये टहलना व व्यायाम क्यों अनिवार्य है  4) सोना (स्लीप) सोना (गोल्ड) से ज्यादा अहम क्यों है और 5) योग और ध्यान का जीवन में कितना महत्व है ? सच मानिये, यदि उपर्युक्त सवालों का सही जवाब नहीं मालूम है तो अपने स्वास्थ्य को अच्छा  बनाये रखना मुश्किल होगा। कहने का तात्पर्य, आपके लिये अपनी जीवनशैली में उपयुक्त बदलाव अनिवार्य  है जिससे कि आप सदैव स्वस्थ एवं सानन्द रह सकें। आशा करनी चाहिए कि हर वक्त काम और व्यस्तता की दुहाई देने वाले हमारे समाज के ऐसे जानकार तथा संपन्न लोग, जिनमें अच्छी संख्या डॉक्टरों की भी है, आगे से यह नहीं भूलेंगे कि ज्ञान और धन का सदुपयोग स्वास्थ्य को साधने में करना सदा ही सुखद और फलदायक होता है। यह हमारी युवा पीढ़ी के लिये उनका एक प्रेरक सन्देश होगा।

                 और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 

Saturday, December 13, 2014

गुड लाइफ : वादा का दावा

                                                     - मिलन सिन्हा 
clip'जो वादा किया है, निभाना पड़ेगा; प्राण जाये, पर वचन न जाये ' - ऐसे जुमलों से हम दो-चार  होते रहे हैं और किसी -न -किसी रूप में ये हमारे मानवीय संस्कारों के साथ घुलमिल गए हैं। यही कारण है कि वादाखिलाफी हमें पसंद नहीं, यह हमें बुरी लगती है। लगे भी क्यों नहीं। वादा एक प्रकार का अलिखित आपसी अनुबंध है, जिसे पूरा करना कानूनन आवश्यक न भी हो, तथापि नैतिक रूप से अनिवार्य होता है । कहना अप्रासंगिक नहीं होगा कि वादा  करना, उसे निभाने का दावा करना और फिर खुद ही उस वादे के दावे की हवा निकाल देना, भारतीय राजनीति के चरित्र का अभिन्न हिस्सा बनता जा रहा है, जो निश्चय ही गांधी, तिलक, सुभाष जैसे लोगों की राजनीति से बिल्कुल अलग है। ऐसे, अब तो वादाखिलाफी समाज के हर क्षेत्र में किसी-न-किसी रूप में दिखने लगा है। बहरहाल, जानकार ख़ुशी होती है कि इस बदलते हुए राजनीतिक -सामजिक परिवेश में  अभी भी देश-विदेश के कई हिस्सों में व्यवसाय के साथ-साथ सामजिक जीवन में वादा निभाने की गौरवशाली परंपरा न केवल बरकरार व अप्रभावित है, बल्कि आधुनिकता एवं तेज रफ़्तार जिन्दगी के बावजूद सुदृढ़ हो रही  है । बिज़नेस मार्केटिंग में अनेकानेक अच्छी और बड़ी कंपनियां अब भी 'वादा कम, पूर्ति ज्यादा' यानि 'प्रॉमिस लेस, डिलीवर मोर' के सिद्धांत को सख्ती से अमल में लाते हैं। इससे ग्राहकों को अतिशय संतुष्टि मिलती है और अनायास ही कंपनी के उत्पादों के प्रति ग्राहकों का विश्वास अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाता है। और हम सब जानते हैं कि 'संतुष्ट ग्राहक चलता-फिरता विज्ञापन होता है '। मार्केट विशेषज्ञ सच ही कहते हैं कि  कंपनी के ब्रांड इमेज में निरन्तर मजबूती के पीछे ये अहम कारण होते हैं। इन सबका गहरा सकारात्मक असर बिज़नेस पर पड़ना लाजिमी है । तभी तो ऐसी कई कंपनियां साल-दर-साल  मार्केट में अच्छा प्रदर्शन के लिये जानी जाती हैं । जाहिर है, इसका बहुआयामी फायदा ऐसी कंपनियों के कर्मचारियों को भी मिलता है । 

                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं          

Tuesday, December 9, 2014

तू-तू , मैं-मैं से सियासी जंग का फैसला नहीं

                                                                                - मिलन सिन्हा 
loading...राजनीति में नेता बनना और अरसे तक बने रहना साधारण बात तो कतई नहीं है। इसके लिए आपको असाधारण एवं असामान्य प्रतिभाओं से लैस होना पड़ेगा, उसमें नयापन लाते रहना पड़ेगा और साथ ही उसे धारदार बनाये रखना पड़ेगा, बात -बेबात, समय -असमय आरोप -प्रत्यारोप के खेल में आप को पारंगत होना पड़ेगा  अन्यथा कम -से -कम बिहार के  राजनीतिक मंच के दिग्गज खिलाड़ी तो आप नहीं बन सकते और न ही माने जाएंगे। प्रदेश के वर्तमान राजनीतिक  सन्दर्भ में  किसी भी मुद्दे पर मीडिया में सत्ता पक्ष व विपक्ष के नेताओं के बीच ज्यादातर अनावश्यक आरोप -प्रत्यारोप से भरे बयानों को देखने -पढ़ने से यह बात स्पष्ट हो जाती है। यह बिहार जैसे पिछड़े प्रदेश के लिए अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है। बहुत पीछे जाने की जरुरत नहीं होगी। पिछले कुछेक हफ़्तों  का यहां का कोई अखबार उठा कर देख लीजिये। इतना ही नहीं,  विरोधियों पर आरोप -प्रत्यारोप के क्रम में जो शब्द इस्तेमाल किये जा रहे हैं, वे संसदीय मर्यादा एवं सामान्य शिष्टाचार के विपरीत हैं। एक तरफ  मुख्यमंत्री मांझी के बहाने पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश पर निशाना साधने की कोशिश होती है, तो दूसरी ओर सुशील मोदी के बहाने नरेन्द्र मोदी पर निशाना साधा जाता है । 

राजनीति में सत्ता पक्ष व विपक्ष द्वारा एक दूसरे के जन विरोधी नीतियों, फैसलों व कार्यकर्मों की आलोचना करना, उनका विरोध करना, गलत करने का आरोप लगाना बिलकुल मुनासिब है और ऐसा न करना लोकतंत्र को कमजोर करना है।  लेकिन सिर्फ विरोध के लिए विरोध करना बिलकुल नाजायज है।  और दुर्भाग्य वश बिहार की राजनीति में आजकल यह खूब हो रहा है। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है ?  कहीं 'गर बदनाम होंगे तो क्या नाम नहीं होगा ' वाली मानसिकता का प्रभाव तो नहीं बढ़ चला है, खासकर आसन्न विधानसभा चुनाव के मद्देनजर। 

कहते हैं, जब सत्य का साथ छूटता जाता है तथा जब तर्क चुकने  लगते हैं, तब झूठे वादों और तथ्यहीन दावों को चीख -चीख कर दोहराना मजबूरी हो जाती है। आंकड़ों का खेल भी चल पड़ता है। सच  तो यह है कि जब तक सार्वजनिक मंचों से झूठ को सच बताने का यह सिलसिला बंद नहीं  होगा, तब तक सकारात्मक राजनीति को  पुनर्स्थापित करना मुश्किल होगा

एक तरफ तो हमारे नेतागण  बार -बार कहते हैं कि जनता बहुत समझदार है , यह पब्लिक है सब जानती है, परन्तु वहीँ  इसके उलट सच को झूठ और झूठ को सच बताने और दिखाने की कोशिश करके क्या ये नेता आम लोगों को बेवकूफ समझने का प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर रहे हैं ? दिलचस्प बात यह भी है कि एक खास रणनीति के तहत ऐसे बयान बाजी के लिए   हाशिये पर पड़े नेताओं का इस्तेमाल किया जाता है जिससे किसी प्रतिकूल स्थिति में दल विशेष के बड़े नेताओं के लिए सुविधापूर्वक उन बयानों से किनारा किया जा सके। लेकिन इन  सबके बीच रणनीति बनाने वाले फिर एक बार आम जनता को बेवकूफ समझने की गलती कर बैठते हैं।  


सोचनेवाली बात है जब आम जनता सब भली-भांति जान व समझ रही है तो उस पर विश्वास कर उसे विवेचना करने दीजिये, मीडिया कर्मियों, राजनीतिक विश्लेषकों को विश्लेषण करने दीजिये। आवश्यक हो तो प्रेस कांफ्रेंस आयोजित कर अपनी बात रखें और  सार्थक सवाल-जवाब  कर लें।  
सवाल तो उठना लाजिमी है कि क्या अपने विरोधी को नीचा दिखाकर, उनकी परछाईं से अपनी परछाईं को बड़ा दिखाकर विकासोन्मुख राजनीति के वर्तमान दौर में कोई भी दल बड़ी सियासी जंग जीत सकता है ? कहते हैं  मुँह से निकली बोली और बंदूक से निकली गोली को वापस लौटाना मुमकिन नहीं होता। फिर बयान बहादुर का खिताब हासिल करने के बजाय आम जनता की भलाई के लिए सही अर्थों में एक भी छोटा कार्य करना नेता कहलाने के लिए क्या ज्यादा  सार्थक नहीं है ? ऐसे भी राजनीतिक नेताओं को राजनीति से थोड़ा ऊपर उठ कर बिहार की  अधिकांश आबादी जिसमें  गरीब, दलित, शोषित -कुपोषित, अशिक्षित, बेरोजगार और बीमार लोग दशकों से शामिल हैं,  की बुनियादी समस्याओं को समय बद्ध सीमा में सुलझाने का क्या कोई भगीरथ प्रयास नहीं करना चाहिए ?    


               और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं


लोकप्रिय हिंदी दैनिक, 'दैनिक भास्कर' में  प्रकाशित दिनांक :09.12.2014

Saturday, December 6, 2014

गुड लाइफ : तराजू एक रखें

                                                                                         - मिलन सिन्हा

clip
ऐसा होना मुनासिब है कि एक ही व्यक्ति का एक ही काम के लिये विभिन्न लोगों द्वारा अलग -अलग, आकलन किया जाए - प्रशंसा या आलोचना की जाए । गैर मुनासिब तो तब लगता है जब एक ही व्यक्ति द्वारा किसी व्यक्ति विशेष का उनके एक ही कार्य हेतु अलग-अलग मंचों से बिल्कुल अलग, कभी-कभी तो एकदम विपरीत  विवेचना की जाती है, वह भी तथ्य और तर्क से परे । राजनीति में तो यह सब रोज का खेल हो गया है जिसका खामियाजा अंततः देश को भुगतना पड़ता है ।

 पर कभी हमने सोचा है कि ऐसा क्यों होता है ? ऐसा इसलिए होता है क्यों कि अलग-अलग आदमी के लिये समय और परिस्थिति के अनुसार विविध प्रकार के तराजू का रिवाज है । डंडी मारने वाली बात से तो हम सब वाकिफ हैं । सो, एक तराजू को हम अपने फायदे के लिये विभिन्न तरीके से काम में लाते हैं या यूँ कहें कि तराजू तो वही दिखता है, लेकिन वाकई होता वह अलग है, अलग -अलग लोगों को तौलने के लिये । कभी सही वजन से ज्यादा वजन दिखाने के लिए तो कभी कम दिखाने के लिये- डंडी मारते हुए । ऐसा हममें से अनेक लोग अपने रोजमर्रा की जिंदगी में बेहिचक करते रहे हैं । 

ऐसा होते हुए देखना भी अब सामान्य बात है । नौकरी हो या स्कूल -कॉलेज में प्रवेश के लिये आयोजित साक्षात्कार का सवाल हो, अलग -अलग तराजू में तौले जाने वाले अनैतिक आचरण का स्वाद चखे बिना रहना मुश्किल है । लोगों के साथ आम व्यवहार में भी कई लोग इस 'तराजू वाली मानसिकता' से ग्रसित नजर आते हैं । ऐसे लोगों को पहचानना एवं उन्हें बेनकाब करना समाज को बेहतर बनाने के लिये जरुरी है, क्योंकि दिखे या न दिखे, यह साफ़ तौर पर अनैतिक व गैरकानूनी है । कहना न होगा, एक तराजू  रखना मतलब नैतिकता, ईमानदारी एवं न्याय का पक्षधर होना है । ऐसे लोग खुद तो विवेकी व विश्वसनीय होते ही हैं, साथ ही उस संस्था की विश्वसनीयता को भी ऊंचाई प्रदान करते हैं, जहां वे पदस्थापित होते हैं । यूँ भी बड़े -बूढ़े कहते हैं कि डंडी मारने वाले को बरकत नहीं मिलती ।

              और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Sunday, November 23, 2014

गुड लाइफ : कस्टमर नहीं, ग्राहक

                                                        - मिलन सिन्हा 
clipदेश -विदेश के सर्विस सेक्टर अर्थात सेवा क्षेत्र में कार्यरत कंपनियों यथा, बैंक, इंश्योरेंस, रेलवे आदि का हमारे दैनंदिन जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। आपने भी इनके दफ्तरों में  लोगों को लम्बी -लम्बी कतारों में खड़े घंटों इंतजार करते देखा होगा। हमारे देश में तो ये दृश्य आम होते हैं। दफ़्तर खुलने का समय जो भी रहे, अमूमन वास्तविक कार्य घोषित समय के कम-से-कम पंद्रह -बीस मिनट बाद ही प्रारम्भ होता है, वह भी बिना कोई कैफियत दिये या खेद व्यक्त किये, जैसे कि देर से परिचालन शुरू करके उन्होंने कुछ गलत करने के बजाय लाइन में खड़े लोगों पर मेहरबानी की है। कई बार यह भी देखने में आता है कि लोगबाग लाइन में खड़े अपनी बारी का इंतजार करते हैं, लेकिन उनकी आँखों के सामने संबंधित स्टाफ आपस में गप्पें लड़ाने या किसी व्यक्तिगत काम में मशगूल रहते हैं। कतारों में चुपचाप खड़े कष्ट झेलने को अभिशप्त ऐसे लोगों को दफ़्तरवाले आम बोलचाल की भाषा में 'कस्टमर' कह कर सम्बोधित करते हैं। अर्थात कष्ट से जो मरे वह कस्टमर। यह नकारात्मक मानसिकता का परिचायक है जो किसी भी व्यवसाय के लिये बहुत नुकसानदेह है। इसके विपरीत अगर 'कस्टमर' के स्थान पर हिन्दी अर्थ 'ग्राहक' कहें और इस शब्द के निहितार्थ पर गौर करके कार्य करने लगें तो सर्विस सेक्टर के सभी कर्मियों के सोच और व्यवहार में गुणात्मक परिवर्तन आ सकता है, साथ में बिज़नेस में उछाल भी। कहने का अभिप्राय, ग्राहक वह जिसे ग्राह्य करने का हक़ है। देखिये, गांधी जी ने ग्राहक के महत्व को किस खूबसूरती से रेखांकित किया है: "हमारे परिसर में आनेवाला ग्राहक अति महत्वपूर्ण व्यक्ति है। वह हमारे ऊपर आश्रित नहीं है, हम उसपर आश्रित हैं। वह हमारे काम-काज के बीच बाधक नहीं है, वह इसका प्रयोजन है। वह हमारे व्यवसाय में कोई बाहरी व्यक्ति नहीं है, वह उसका एक अंग है। हम उसकी सेवा करके उस पर कोई कृपा नहीं कर रहे हैं, वह हमें ऐसा करने का सुअवसर प्रदान कर हम पर कृपा कर रहा है।" 

          और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं
# 'प्रभात खबर' के मेरे संडे कॉलम, 'गुड लाइफ' में प्रकाशित

Sunday, November 16, 2014

गुड लाइफ : नहीं करें चापलूसी

                                                            - मिलन सिन्हा 
clipप्रशंसा किसे अच्छी नहीं लगती - छोटे -बड़े , गरीब -अमीर, अपने -पराये सबको। कहते हैं आलोचना के लिये साहस की जरुरत नहीं होती है, पर प्रशंसा के लिये होती है। दीगर बात तो यह है कि सच्ची एवं समय पर प्रशंसा सबके बस की बात नहीं होती है। इसके लिये साफ़ दिल और खुले दिमाग के साथ -साथ आत्मिक बल की आवश्यकता होती है। इतना ही नहीं, प्रशंसा हमेशा सबके सामने करनी चाहिए जिससे उस व्यक्ति के साथ -साथ वहां उपस्थित लोगों को भी अच्छा लगे, प्रोत्साहन मिले । लेकिन क्या ऐसा होता है ? सामान्यतः हम देखते हैं कि लोग किसी को मात्र खुश करने के मकसद से उनकी तारीफ़ करते हैं जो थोड़े समय के बाद अंततः चापलूसी का रूप ले लेता है। ऐसा तब और भी स्पष्ट साफ़ हो जाता है जब हम किसी के अच्छे काम की तारीफ़ करने के बजाय उस व्यक्ति की यूँ ही तारीफ़ करने लगते हैं। जैसे कि आप जैसा दिलदार आदमी तो हमने अब तक नहीं देखा, आप इतने स्मार्ट कैसे हैं, आपके अंदाज तो वाकई बेमिसाल हैं आदि, आदि। राजनीति में ऐसी चापलूसी आम है। जाहिर है,ऐसा स्वार्थवश किया जाता है। हाँ, कई बार अच्छी मंशा से की जाने वाली प्रशंसा भी खुशामद प्रतीत होती है क्योंकि उस प्रक्रिया में अतिरेक का तत्व अनायास ही शामिल हो जाता है। लिहाजा किसी की तारीफ़ करते वक्त इस बात का ध्यान रखना चाहिए। 

दरअसल प्रशंसा सुनना आम आदमी की फितरत में शुमार है। और सही प्रशंसा तो किसी भी मनुष्य को और बेहतर कार्य करने  के लिये उत्प्रेरित करता है। देखिये, जो भी जब भी कोई अच्छा काम करे और उसे उसके लिये वाहवाही मिले, प्रशंसा मिले तो निश्चय ही वह और अच्छे काम करने को प्रेरित होगा जिसका सकारात्मक असर उसके परिवार के साथ -साथ पूरे समाज पर पड़ना लाजिमी है । कहना न होगा,  प्रशंसा जैसे सरल पर बेहद प्रभावी मनोवैज्ञानिक औजार से अच्छे काम करनेवालों की तादाद में अप्रत्याशित बढ़ोतरी करके किसी भी समाज और देश को बहुत मजबूत बनाया जा सकता है।

                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Friday, November 14, 2014

गरीब बच्चों के लिए बाल दिवस का क्या मतलब?

                                                                     -  मिलन सिन्हा

bal diwasफिर  बाल दिवस आ गया और चाचा नेहरु का जन्म दिवस भी ।  फिर अनेक  सरकारी- गैर सरकारी  आयोजन होंगे ।  स्कूलों में  पिछले वर्षों की भांति कई कार्यक्रमों का आयोजन होगा, ढेरों  बातें होंगी,  बच्चों की  भलाई के   लिए ढेर सारे वादे किये जायेंगे, तालियां बजेंगी, मीडिया में तमाम ख़बरें होंगी । इस साल ये सब कुछ थोड़ा ज्यादा और जुदा भी होगा क्यों कि बच्चों की बेहतरी के लिए समर्पित  दो शख्सियतों, सत्यार्थी व मलाला को नोबल शांति पुरस्कार जो मिला है । हां, आजाद  भारत  के पहले प्रधान मंत्री और बच्चों के चाचा नेहरू के जन्म दिन के उपलक्ष्य में भी अनेक कार्यक्रम आयोजित किये जायेंगे । बस और क्या ?

ज़रा सोचिये, इस मौके पर  पूरे  देश में  जितने रूपये सारे सरकारी - गैर सरकारी आयोजनों में खर्च होंगे तथा खर्च  हुए दिखाए जायेंगे, उतनी  भी राशि अगर कुछ गरीब, बेसहारा, कुपोषित बच्चों के भलाई के लिए  कुछ बेहद पिछड़े गांवों में   खर्च किये जाएं  तो बच्चों का कुछ तो भला होगा ।

आजादी के 67  साल बाद भी पूरी आजादी से गरीब छोटे बच्चे सिपाही जी को रेलवे के किसी स्टेशन पर या चलती ट्रेन में मुफ्त में गुटखा, सिगरेट,बीड़ी या तम्बाकू खिलाता,पिलाता दिख जायेगा। वैसे ही दिख जाएगा  नेताओं, मंत्रियों, अधिकारियों  के घर में भी  नौकर के रूप में काम करते हुए  लाचार,  बेवश  छोटे गरीब बच्चे। सड़क किनारे छोटे होटलों, ढाबों, अनेक छोटे-मोटे कारखानों, दुकानों आदि में ऐसे छोटे बच्चे सुबह से शाम तक हर तरह का काम करते मिल जायेंगे ।  यह सब देख कर ऐसा प्रतीत  होता है कि हमारे देश में जन्म से ही गरीब तबके के  बच्चों के साथ  लापरवाही या जैसे-तैसे पेश आने का प्रचलन  रहा हो ।


बहरहाल, इस मौके पर निम्नलिखित तथ्यों पर गौर करना प्रासंगिक होगा ।  बच्चों के अधिकार पर आयोजित संयुक्त राष्ट्र संघ अधिवेशन में पारित प्रस्ताव के अनुसार 18 वर्ष से कम आयु के लड़का और लड़की को बच्चों की श्रेणी में रखा जाता है ।  भारतवर्ष में बच्चों की कुल संख्या देश की आबादी का 40% है, यानी करीब 48 करोड़ ।  देश में हर घंटे 100 बच्चों की मृत्यु होती है ।  भारत में बाल मृत्यु  दर (प्रति 1000 बच्चों के जन्म पर ) अनेक राज्यों में 50 से ज्यादा है जब कि इसे 30 से नीचे लाने की आवश्यकता है ।  दुनिया के एक तिहाई  कुपोषित  बच्चे भारत में रहते हैं ।   देश में आधे से ज्यादा बच्चे कुपोषण के कारण  मरते हैं ।   पांच साल तक के बच्चों में 42% बच्चे कुपोषण के शिकार हैं ।  जो बच्चे स्कूल जाते है  उनमें  से 40% से ज्यादा बीच में ही स्कूल छोड़ देते हैं जब कि शिक्षा के अधिकार कानून के तहत उनके स्कूली शिक्षा के लिए सरकार को हर उपाय  करना है ।  हाल के वर्षों  में बच्चों के खिलाफ अपराध के मामलों में वृद्धि हुई है

 इस तरह  के अन्य अनेक तथ्यों से हम पढ़े-लिखे, खाते-पीते लोग रूबरू होते रहते है । वक्त मिले तो कभी -कभार थोड़ी चर्चा भी कर लेते हैं । लेकिन, अब  सरकार के साथ-साथ हमारे प्रबुद्ध तथा संपन्न समाज को भी इस विषय पर गंभीरता से सोचना पड़ेगा और संविधान/कानून  के मुताबिक  जल्द ही कुछ  प्रभावी कदम  उठाने पड़ेंगे, नहीं तो इन गरीब, शोषित, कुपोषित,अशिक्षित बच्चों की बढती आबादी आने वाले वर्षों  में देश के सामने बहुत  बड़ी और बहुआयामी चुनौती पेश करनेवाले हैं । ऐसे  भी, हम कब तक सिर्फ  सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी), शाइनिंग इंडिया, अच्छे दिन आने वाले हैं जैसे लुभावने जुमलों से देश की करोड़ों विपन्न लोगों और उनके नौनिहालों को छलते रहेंगे ।

                  और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

# प्रवक्ता.कॉम में प्रकाशित 

Monday, November 10, 2014

गुड लाइफ : जो करें, मन से करें

                                                   - मिलन सिन्हा
जो भी करना, मन लगा कर करना - मन लगाकर पढ़ना , मन लगाकर काम  करना  - इस तरह की नसीहत बचपन से लेकर बड़े होने तक, घर-स्कूल से लेकर ऑफिस तक बड़े -बुजुर्ग व वरिष्ठ अधिकारी -सहयोगी हमें हमारी बेहतरी के लिये देते रहे हैं। लेकिन क्या हमने कभी गंभीरता से इस सवाल पर विचार किया है कि काम करने और मन लगाकर काम करने में वाकई कोई बुनियादी फर्क है ? सच मानिए, छोटा -मोटा फर्क नहीं, जमीन -आसमान का फर्क है ! आखिर कैसे ? कुछ वैसे ही जैसे क्लास में शिक्षक पूरा चैप्टर पढ़ा गए और अंत में जब हमसे उन्होंने एक छोटा-सा प्रश्न पूछा तो हम उत्तर नहीं दे सके, जब कि अन्य कई सहपाठियों  ने न केवल उस सवाल का बल्कि उक्त  क्लास में पढ़ाये गए और कई सवालों का जवाब आसानी से दे दिया। ऐसा कैसे सम्भव हुआ ?  दरअसल, तन से तो हम वहां मौजूद थे और शिक्षक महोदय द्वारा पढ़ाये जाने वाले विषय के प्रति तन्मय भी दिख रहे थे, लेकिन क्या हमारा मन वहां था ? शर्तिया नहीं ! पढ़ने, काम करने आदि की बात छोड़ें, बहुत लोग तो क्या खा रहे हैं, कितना खा रहे हैं - उसकी बाबत पूछने पर  कि  क्या -क्या चीजें घंटे भर पहले खाईं, बताने में असमर्थ रहते हैं। किसी भी कार्य में बस यूँ  ही लगे रहने और मन से उसे करने में यही मूलभूत अंतर होता है। जब हम किसी काम को मन से करते हैं तो न केवल उसमें अपेक्षित रूचि लेते हैं, पूरी तन्मयता से उसे अंजाम देने  की भरपूर कोशिश करते हैं, बल्कि  उस काम को संपन्न  करने का पूरा आनंद भी महसूस करते हैं  इसके विपरीत जब हम उसी काम को बेमन से करते हैं, बोझ समझकर करते हैं तो उस कार्य की गुणवत्ता तो प्रभावित होती ही है, कार्य पूरा होने के बाद भी आनंद की अनुभूति नहीं होती है, सिर्फ यह लगता है कि सिर से बोझ उतर गया।  काबिलेगौर बात यह भी है कि मन से काम करने से हमारी कार्यक्षमता बढ़ती है, आत्मविश्वास में इजाफा होता है, समय का पूरा सदुपयोग होता है और साथ में उक्त कार्यक्षेत्र में हमारी एक अच्छी पहचान भी बनती है  

             और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Sunday, November 2, 2014

गुड लाइफ : दिखावा क्यों करें ?

                                                                    - मिलन सिन्हा
 अच्छा होना और अच्छा दिखना तो अच्छी बात है, परन्तु इसके विपरीत सिर्फ दिखावाआडम्बर आदि  से रुतबा बढ़ाने के बढ़ते चलन को क्या कहेंगे । एक नहीं अब तो कई एक  मुखौटे लगा कर चलनेवाले लोगों की कमी नहीं है । असली -नकली की पहचान मुश्किल हो रही है । नकली सामान से लेकर नकली चेहरे दिखाकर  बाजार में खूब खरीद-बिक्री हो रही है । मार्केटिंग की दुनिया का आम जुमला, 'जो दिखता हैवही बिकता हैका असर बाजारवाद के मौजूदा दौर में सब तरफ दिखाई पड़ रहा है । 

कहने का अभिप्राय यह कि दिखाने की ख्वाइश का जोर और दबदबा हर क्षेत्र में सिर चढ़ कर बोल रहा है ।  लेकिन इसका दिलचस्प पहलू यह है कि इस दिखने -दिखाने में छुपाने पर बहुत ध्यान दिया जाता है । बल्कि यूँ कहें तो छुपाना ही दिखाने की कला को सफल बनाने की पहली अहम शर्त बनती जा रही है तमाम तरह के फेयरनेस क्रीम व अन्य सौंदर्य प्रसाधनों से चेहरे आदि को रंगने की कवायद कुछ अलग दिखने -दिखाने की चाहत का एक मजबूत पक्ष  है । 

दिखाने में ही क्योंबोलने में भी यही प्रचलन है - मन में कुछ होता है लेकिन मंच से कुछ अलग ही बोलते हैं । फलतः जब  बोलते हैं तो विषयवस्तु पर फोकस नहीं कर पाते । दुःख की बात है कि  यह सब करते हुए हम अपनी  मौलिकता से दूर जाते रहते हैं और अंततः खुद से कट कर एक अजीब सी शख्सियत के मालिक बन बैठते हैं । 

क्या कभी हमने यह भी सोचा है कि दिखावा करने के चलते हमारे कितने धनसमय और ऊर्जा का अपव्यय होता है । सच पूछिये तो  खुद को छुपाने और जो हम नहीं हैंवह दिखाने की कोशिश हमें झूठ एवं फरेब के रास्ते पर ले जानेवाला  साबित होता हैजुर्म की अंधी गली में पहुंचने को उत्प्रेरित करता है

क्या गांधीलिंकनआइंस्टीनमदर टेरेसामंडेला सरीखे देश -दुनिया के बड़े व सम्माननीय लोग  सरलसादा और मौलिक जीवन जी कर लाखों -करोड़ों लोगों के लिये प्रेरक व अनुकरणीय नहीं बने ?  दरअसलदिखावे से बचना गुड लाइफ की एक अनिवार्य शर्त है । 

                              और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Saturday, October 18, 2014

गुड लाइफ : इस बार पटाखे रहित दीवाली, प्लीज

                                                                                - मिलन सिन्हा 
आनन्द, उल्लास एवं प्रकाश का पर्व दीपावली सामने है। अंधकार पर प्रकाश की विजय के इस  त्योहार को पूरे देश  के हर गाँव -शहर में  मिलजुल कर मनाने की गौरवशाली परम्परा रही है। इस पावन मौके पर बच्चे और युवा ही क्यों, घर के बड़े -बूढ़े भी उत्साह व उमंग से भरे नजर आते हैं। लेकिन पिछले कई वर्षों से इस पावन उत्सव के साथ ध्वनि प्रदूषण एवं वायु प्रदूषण का  गंभीर  जुड़ाव स्पष्ट दिखाई पड़ रहा  है, जो वाकई चिन्ता का विषय है। दरअसल, पटाखे आदि के बढ़ते प्रयोग से शोर तो होता है, साथ में धुंए के रूप में अनेक हानिकारक गैस हमारे पर्यावरण को और भी दूषित करते हैं। ज्ञातव्य है कि अनेक जाने -पहचाने कारणों से हमारे देश में ध्वनि/वायु प्रदूषण जानलेवा स्तर तक पहुँचने लगा है। परिणामस्वरूप, एक बड़ी आबादी दमा, हृदय रोग, कैंसर, चर्म रोग आदि से ग्रस्त हैं । गर्ववती महिलाएं और पांच साल तक के बच्चे ऐसे  प्रदूषण से बुरी तरह प्रभावित होते हैं। इतना ही नहीं, इससे पशु-पक्षी एवं वनस्पति तक को गहरी क्षति होती है। देश की राजधानी दिल्ली तो विश्व के कुछ सबसे बड़े प्रदूषित शहरों में शामिल हो गया है। तो आखिर क्या करें? इस बार भी पटाखे व आतिशबाजी के खेल में चाहे -अनचाहे शामिल रहें  या  इस नुकसानदेह  ट्रेंड को रोकने  के लिए व्यक्तिगत एवं सामजिक स्तर पर कुछ पहल करें और उन तमाम कोशिशों को अंजाम तक पहुँचाने  में बढ़-चढ़ कर भाग लें। हाँ, सरकार को भी इससे संबंधित कानूनी प्रावधानों को  सख्ती से लागू करने के लिए लोकतांत्रिक तरीके से मजबूर करने की जरुरत तो है ही। बहरहाल, ख़ुशी की बात है कि पटना सहित देश के अनेक भागों में हमारे स्कूली बच्चे इस बार और भविष्य में हर बार ग्रीन दीवाली मनाने का संकल्प ले रहे हैं। बच्चों ने प्रदूषण रहित दीवाली मनाने के लिये अन्य लोगों से अपील करने का फैसला भी किया है जो एक सराहनीय शुरुआत है। आशा है, हम सबका सम्मिलित प्रयास "नो क्रैकर" अभियान को आगे बढ़ाने में जरूर कामयाब होगा जिससे सबकी दीवाली स्वस्थ, शुभ और आनन्दमय हो सके 

            और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Tuesday, October 14, 2014

आज की कविता : जगत मिलन

                                                                  - मिलन सिन्हा 
adventurer

जगत मिलन 

सख्त चेहरा था उसका 
पत्थर जैसा 
झांक कर देखा अंदर 
बच्चों -सा दिल 
मोम -सा पिघलने लगा 
संकल्प था उसके मन में 
सपना सबका पूरा करूँगा 
मिलन का वातावरण होगा 
हर होंठ पर स्मिति ला दूंगा 
शालीन बनकर साथ रहूँगा। 

                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

प्रवक्ता . कॉम पर प्रकाशित, दिनांक :07.06.2014

Sunday, October 12, 2014

गुड लाइफ: परिवर्तन स्थायी है

                                                          - मिलन सिन्हा
clipसमय बदलता रहता है और बदलता रहता है हम सबका जीवन। आम तौर पर  परिवर्तन के साथ अनिश्चितता और शंका -आशंका तो होती है, पर साथ होता है अनजाने- अनदेखे के प्रति जिज्ञासा व उत्साह भी। ऐसे में, परिवर्तन निराशा व भय से भरा हो सकता है, तो ऊर्जा एवं उम्मीद से भरा भी। परन्तु, यह जरूर हमारे अख्तियार में होता है कि हम इसे सकारात्मक रूप से लेते हैं या फिर नकारात्मक तौर पर। जो भी हो, दिलचस्प बात यह है कि  परिवर्तन हमें  जड़ता व 'कम्फर्ट जोन' से बाहर निकलने का अवसर देता है और कई बार मजबूर भी करता है। देखिये न, हाल ही में संयुक्त राष्ट्र संघ में दिये गए हमारे प्रधानमंत्री के भाषण में भी परिवर्तन को अंगीकार कर एक बेहतर भविष्य की ओर बढ़ने का आह्वान किया गया। 

शाश्वत सत्य यह है कि परिवर्तन एक स्थायी प्रक्रिया है। लिहाजा, परिवर्तन के प्रति अपने नजरिये को परिवर्तित करना जरुरी होता है। देखें तो ऐसा हम सब सुबह से शाम तक करने की कोशिश भी करते हैं। घर हो या दफ्तर, स्कूल या कॉलेज, अस्पताल  या  बाजार  हर जगह  हमारा रोज कितने प्रकार के बदलावों से सामना होता  है, उनसे हमें निबटना पड़ता है। बेशक ये बदलाव छोटे -मोटे  तथा  जाने-पहचाने  होते हैं, लिहाजा  हमें परेशान नहीं करते। हम इनसे आसानी से पार पा लेते हैं। हाँ, ये सही है कि बड़े परिवर्तन हमारे लिये कठिनाई पैदा करते हैं। लेकिन यह भी तो सही है कि अगर कठिनाई है तो उसका कोई-न-कोई  निदान भी है। और फिर कठिनाई के उस पार संघर्ष से अर्जित उपलब्धि का आनन्द भी तो होता है। सो, करना यह चाहिए कि हर ऐसे बदलाव से जुड़े तथ्यों की जानकारी पाने की कोशिश करें; इसके सकारात्मक पक्ष को देखें; बदलाव को भावनात्मक स्तर पर लेने के बजाय पेशेवर तरीके से लें आदि, आदि । ऐसा पाया गया है कि ऐसे मौकों पर जो लोग व्यक्तिगत हठ छोड़कर मानसिक रूप से लचीला बने रहते हैं, उनके लिये परिवर्तन को एन्जॉय करना आसान हो जाता है देश-विदेश के अनेक राजनीतिक नेता इसके बेहतर उदाहरण रहे हैं।  

              और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

# 'प्रभात खबर' के मेरे संडे कॉलम, 'गुड लाइफ' में प्रकाशित, दिनांक : 12.10.2014

Friday, October 3, 2014

आज की कविता : जीवन के बीज

                                                        - मिलन सिन्हा 
blue sky grass trees hd picture

जीवन के बीज

बारिश होती है 
भागता है शहरी 
तलाशता है छत 
पीता  है चाय 

बारिश होती है
झूमता है देहाती 
बाहर आता है छोड़कर छत 
बोता है जीवन के बीज।


               और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

प्रवक्ता . कॉम पर प्रकाशित, दिनांक :07.06.2014

Sunday, September 28, 2014

गुड लाइफ: सुनने के फायदे

                                                                - मिलन सिन्हा
सुनना एक कला है और एक लोकतांत्रिक सोच भी - यह हमने अनेकों बार सुना है ।  कहा जाता है कि खुली आंख, खुला कान और खुले दिमाग वाले लोग अपेक्षाकृत ज्यादा संतुलित, मर्यादित एवं संयमित होते हैं । अच्छे श्रोता का अच्छा वक्ता होना स्वाभाविक माना गया है ऐसे भी, आम लोगों  की यह धारणा गलत नहीं है कि जो नेता -प्रतिनिधि जनता की बात ठीक से  सुनते तक नहीं हैं उनसे काम करने -करवाने की उम्मीद करना बेकार है । आप भी जानते हैं कि मरीज एवं उनके परिजन ऐसे डॉक्टरों से परेशान व पीड़ित रहते हैं जो रोगी की पूरी बात अच्छी तरह सुनने से पहले ही उपचार पर्ची (प्रिस्क्रिप्शन) लिख देते हैं । अनेक अभिभावकों और शिक्षकों का अपने बच्चों तथा विद्यार्थियों से पेश आने का यही तरीका है । ज्ञातव्य है कि अधिकारियों विशेषकर प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों में  आम तौर पर श्रवण संयम की कमी पाई जाती है । दरअसल, अच्छी तरह सुनना न केवल बोलनेवाले के प्रति सम्मान प्रदर्शित करता है, बल्कि किसी भी सफल संवाद प्रक्रिया की अनिवार्य शर्त भी होती है । अधूरा सुनने एवं उस आधार पर मत बनाने का परिणाम सामान्यतः बहुत घातक और नुकसानदेह होता है । सच पूछिये तो हममें से अधिकांश लोग शरीर से तो वक्ता के साथ दिखाई देते हैं, लेकिन दिमाग से कहीं और होते हैं ।  दूसरे, बहुधा हम बोलनेवाले की बातों को समझने, जानने तथा सीखने के लिये नहीं, अपितु  सवाल -जवाब करने  की मंशा से सुनते हैं । यही हमारे लिये विषय वस्तु से भटकने  और जवाब में ऊलजलूल बोलने का कारण बनता है । आजकल के टीवी बहसों में शामिल लोगों के साथ -साथ एंकरों के भी लगातार चीखते रहने और अंततः बहस को अर्थहीन बनाने का सबब भी यही है । महान व्यक्तियों की जीवनी पढ़ने तथा अपने आसपास के अच्छे लोगों का व्यवहार आदि को देखने से साफ़ हो जाता है कि वे किस तन्मयता से छोटे-बड़े सबकी बात या समस्या सुनते हैं और उन्हीं बातचीत में से समाधान का सूत्र तलाशने में कामयाब होते हैं । 

            और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Sunday, September 21, 2014

गुड लाइफ : आहार और स्वास्थ्य

                                                                                  - मिलन सिन्हा 
यह सर्वविदित है कि प्राणी मात्र को जीवित रहने के लिए आहार की आवश्यकता होती है । हम यह भी जानते हैं कि अलग -अलग जीवों के लिये आहार का प्रकार अलग -अलग होता है । लेकिन इनकी संख्या सीमित होती है सिवाय मानव जाति के ।  दिलचस्प तथ्य यह है कि मनुष्य द्वारा निर्मित इस संसार के अलग -अलग देश और समाज में प्राकृतिक और पारम्परिक कारणों से आहार से मुतल्लिक एक  बहुरंगी व अदभुत दुनिया रात-दिन सक्रिय है । अन्न, फल, साग, सब्जी से लेकर दूध, अंडा, मांस, मछली आदि तक इस आहार संसार में शुमार हैं ।  इन चीजों पर आधारित नाना प्रकार के प्राकृतिक व कृत्रिम व्यंजन का सेवन हम घर -बाहर सुबह से रात तक करते हैं, फिर भी हमारे पांच इंच के जीभ की स्वाद पिपासा कम होने का नाम नहीं लेती ।  फलतः गृहणियां और शेफ-कुक नये-नये पकवानों पर न केवल शोध करते रहते हैं, बल्कि उन्हें तैयार भी करते हैं और हमें खिलाते भी हैं । लेकिन  क्या हमने  कभी जानने की कोशिश की  है कि जीभ को संतुष्ट करने के चक्कर में हम दिनभर क्या-क्या और कितना खाते रहते हैं और इसका कैसा असर हमारे स्वास्थ्य पर पड़ता है ? हम क्या, क्यों, कब और कितना  खा रहे हैं - आहार से संबंधित ये बातें अहम व विचारणीय नहीं हैं क्या ? आखिर जो कुछ भी हमारे मुंह से पेट तक जाएगा, उसका लाभ -नुकसान हमें ही उठाना पड़ेगा; उसका अवशेष भी हमारे शरीर से ही निकलेगा ।  हम जानते हैं कि पौष्टिक आहार से  प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फैट, विटामिन, मिनिरल आदि पर्याप्त मात्रा में मिल जाता है जो हमें शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ रखने के लिए जरूरी है । इस विषय में  स्वास्थ्य विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है कि एक सामान्य इंसान को सुबह का नाश्ता सबसे पौष्टिक और ज्यादा मात्रा में लेना चाहिए । दोपहर का खाना नाश्ते की तुलना में हल्का और रात का खाना तो बिलकुल ही सादा एवं हल्का होना चाहिए । जरा सोचिये, क्या हम ऐसा करते हैं; हमारे बच्चों -युवाओं की खान-पान की शैली कैसी है; क्या हम जीने  के लिये  खाते हैं या  खाने के लिये जीते   हैं ?

        और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Friday, September 19, 2014

आज की कविता : प्रतीक

                                                           - मिलन सिन्हा 















यह पेड़ है 
हम सबका पेड़ है। 

इसे मत छांटो 
इसे मत तोड़ो 
इसे मत काटो 
इसे मत उखाड़ो 
इसे फलने दो 
इसे फूलने दो 
इसे हंसने दो 
इसे गाने दो 

यह पेड़ है 
हम सबका पेड़ है। 

इस पर सबके घोसले हैं 
कौआ का है, मैना का है 
बगुला का है, तोता का है 
सब मिलकर रहते हैं 
सब खुशहाल हैं 
सब आबाद हैं 
इसे बरबाद मत करो 
इनकी भावनाओं को मत छेड़ो 

यह पेड़ है 
हम सबका पेड़ है। 

यह हमारा अतीत है 
यह हमारा वर्तमान है 
यह हमारा भविष्य है 
इसमें ऊंचाई है 
इसमें गहराई है 
इसमें दूरदृष्टि है 
ईश्वर की यह अपूर्व सृष्टि है 

यह पेड़ है 
हम सबका पेड़ है।  

इस पर अनेक अत्याचार हुए
इस पर अनेक आक्रमण हुए 
इसे तोड़ने के अनेक षड्यंत्र हुए 
फिर भी यह झुका नहीं 
टूटा नहीं, उखड़ा नहीं 
बलिदान का पर्याय है यह 
धैर्य और त्याग का नमूना है यह 
इसे आदर दो, प्यार दो 

यह पेड़ है 
हम सबका पेड़ है। 

इसने सिर्फ देना ही सीखा 
फल दिया, फूल दिया 
संगीत दिया, सुगंध दिया 
हमारे जीवन को सुखमय किया 
यह हमारी सभ्यता, संस्कृति का प्रतीक है 
इसके बिना हमारा क्या अस्तित्व है 
हाँ, यह पेड़ नहीं, समझो देश है 
अब कहना क्या शेष है 

यह पेड़ है 
हम सबका पेड़ है। 

      और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Sunday, September 14, 2014

गुड लाइफ : संगीत मन को पंख लगाये

                                                                           - मिलन  सिन्हा 
आज हर आम आदमी की जिन्दगी में शोर, अनिश्चितता और कन्फूयजन  बढ़ रहा है।  कारण एक नहीं, कई हैं - जाने, पहचाने और अनजाने भी। मनुष्य आम बुनियादी समस्याओं के बीच शांति और सकून को तलाशता रहता है, जो जीवन को गतिमान बनाये रखने के लिए अनिवार्य है। विशेषज्ञ भी कहते हैं कि शांति और सकून जीवन में  नई ऊर्जा एवं उत्साह का सृजन करते हैं। और यह भी सही है कि जीवन में शांति, सकून और संगीत का बेहद करीबी रिश्ता रहा है। भाग-दौड़ से भरी तथा द्वेष-वैमनस्य  से रू-ब-रू होती हमारी दैनंदिन जिन्दगी में संगीत मधुरता घोलने का काम करता  है। संगीत के संगत में आदमी व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामजिक तनाव को कम कर सकता है। सामाजिक सदभाव व समरसता बढ़ाने में संगीत की महत्वपूर्ण भूमिका सदियों से रही है । शादी-विवाह से लेकर हर खुशी के मौके पर हम संगीत का आनन्द उठाते हैं। इतना ही नहीं, हर धर्म में ईश्वर की  उपासना-प्रार्थना के लिए लोग गाते है, मौके को संगीतमय बनाते हैं। सच कहें तो, संगीत हमें ईश्वर से जोड़ने का काम बखूबी करता है  शायद यही कारण है कि मनुष्य के अलावे पशु ,पक्षी, पेड़ -पौधे सभी संगीत से प्रभावित होते पाये गए हैं। 

मजेदार बात यह है कि संगीत सुनने, सीखने और समझने की कोई उम्र नहीं होती। यह तो हमारे श्वास से जुड़ा है और अन्तिम श्वास तक साथ रहता है। सो इसे शौक के रूप में कभी भी विकसित किया जा सकता हैसंगीत का साथ  न केवल हमारे व्यक्तित्व में निखार लाता है, बल्कि हमें शारीरिक और मानसिक रूप में स्वस्थ रखने में कारगर भूमिका अदा करता है। मानसिक तनाव से परेशान रहने वाले लोगों के लिए तो संगीत बेहद प्रभावी औषधि का काम करता है ज्ञानीजन कहते हैं कि जिनके जीवन में लय,ताल व सुर का अभाव होता है, उनका स्वभाव असुर जैसा हो, तो इसमें अस्वाभाविक क्या है ? तो आइये गुनगुनाते हैं प्रख्यात गायक मन्ना डे के एक गाने के ये अनमोल बोल : सुर के बिना जीवन सूना ....संगीत मन को पंख लगाये  ....

    और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।

Thursday, September 11, 2014

आज की कविता : सागर में नाव

                                                          - मिलन सिन्हा 
Boat Silhouette Stock Photo

सागर में नाव

जीवन
एक नाव है
मौत
सागर समान है
कब कोई
उफान आवे
और
लील ले
नाव को
कोई कैसे
कह सकता है ?

 और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Tuesday, September 9, 2014

देखना होगा 'न खाऊंगा, न खाने दूंगा' का असर

                                                                                     - मिलन सिन्हा
इस बात से कौन इंकार कर सकता है कि सत्तर के दशक से राजनीति में धन बल और बाहुबल के साथ अनैतिकता का जो नया दौर संगठित  रूप से प्रारम्भ हुआ उसने इस शताब्दी के पिछले दस वर्षों में नई ऊंचाई को छू लिया है। राजनीतिक नेताओं के रहन -सहन व चरित्र में आए बदलाव का व्यापक असर अब साफ़ तौर पर कार्यकर्ताओं के जीवन शैली में भी दिखने लगा है। अपने दल और नेता के प्रति कार्यकर्ताओं की प्रतिबद्धता अब वैचारिक कम, व्यावसायिक ज्यादा होती जा रही है। सिद्धान्त के बदले अब उन्हें व्यक्तिगत नफे -नुकसान की फ़िक्र अधिक है। नतीजतन हमें चुनावों से पूर्व नेताओं के साथ -साथ कार्यकर्ताओं के अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में निःसंकोच चले जाना  सहज ही दिख जाता है।

 मोटे तौर पर राजनीति व्यवसाय का पर्याय बनती जा रही है। शायद तभी नेता की तरह कार्यकर्ता भी अपनी -अपनी आर्थिक स्थिति को जल्द से जल्द मजबूत बनाने में जुट गए हैं -अधिकतर मामले में अवांछित तरीके से। ऐसे कार्यकर्ताओं पर पंचायत, प्रखंड, जिला व प्रदेश स्तर पर बिचौलिये या एजेंट के रूप में सक्रिय बने रहने के आरोप लगते रहे हैं। ऐसे में क्या  यह कहना अनुचित होगा कि नेता हो या कार्यकर्त्ता, जिसे जहाँ मौका मिलेगा, सार्वजनिक संपत्ति हड़पने में पीछे नहीं रहेगा जैसा कि लोहिया ने कई दशकों पहले भविष्यवाणी की थी। 

सवाल उठता है कि क्या राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम पर दशकों से राजनीति की दूकान चलानेवाले लोगों ने साधन एवं साध्य की शुद्धता की उनकी नीति को तिलांजलि दे दी है ? आखिर देश -प्रदेश हर जगह कमोवेश ऐसे हालत क्यों कर हो गए और इससे आगे का रास्ता  क्या  और बुरा होगा ?

आजादी के बाद  राजनीतिक -सामजिक मुद्दों पर आधारित सबसे बड़े आन्दोलन लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चलाया गया जिसमें करीब सभी गैर कांग्रेसी दलों के नेताओं -कार्यकर्ताओं के साथ-साथ बड़ी संख्या में छात्रों ने भाग लिया, जुल्म सहे, यातनाएं झेलीं और  जेल गए। उस दरम्यान पार्टी कार्यकर्ताओं में परिवर्तन के प्रति एक प्रतिबद्धता दिखाई पड़ती थी। आन्दोलन में शामिल होना आर्थिक लाभ -हानि  से कदाचित ही प्रेरित रहा हो। गुजरात से शुरू हुए सम्पूर्ण क्रांति आन्दोलन का केन्द्र बिहार रहा। 

1977 में  केन्द्र सहित कई प्रदेशों में सत्ता परिवर्तन हो गया और जनता पार्टी की सरकार भी बन गयी।   लालू  प्रसाद , नीतीश कुमार, सुशील मोदी, रवि शंकर प्रसाद सरीखे प्रदेश के नेता  उसी आन्दोलन से निकले।  लेकिन  लोकनायक के तमाम प्रयासों के बावजूद सामाजिक क्रांति के महती लक्ष्य को जनता पार्टी की केन्द्र और राज्यों की सरकारें अपने ही नेताओं के बीच महत्वाकांक्षा से प्रेरित टकराव के कारण आगे बढ़ाने में नाकामयाब रही। इसका बड़ा राजनीतिक खामियाजा जनता पार्टी व सरकार को अगले चुनाव में उठाना पड़ा। कहना न होगा, सम्पूर्ण क्रांति जैसे बड़े एवं सफल आन्दोलन के गर्भ से निकली सरकार के गिरने से आन्दोलन से जुड़े लाखों करोड़ों लोगों को गहरा झटका लगा। कार्यकर्त्ता ठगे से महसूस करते रहे। नेतागण तो समय के साथ  अपनी राजनीतिक यात्रा में  बढ़ते गए, आर्थिक रूप से मजबूत बनते गए। पार्टी कार्यकर्ताओं ने यह सब गौर से देखा, जाना और समझा।

आर्थिक उदारीकरण ने बिहार की सत्ता के करीब रहे नेताओं के बड़े वर्ग को आर्थिक रूप से मजबूत होने की प्रेरणा भी दी और मौके भी दिए जिनका भरपूर उपयोग इन लोगों ने अगले कई वर्षों तक धन बल से सम्पन्न होने के लिये किया। 

'हम भी खाते हैं, तुम भी खाओ' वाली नीति पर चलने का मन्त्र कार्यकर्ताओं को अपने नेताओं से ही मिला। सरकारी ठेकेदारी में पार्टी के लोगों का वर्चस्व कायम होने लगा। विधायक एवं सांसद निधि ने इस सिलसिले को आगे ही बढ़ाया। 


 अन्ना के आन्दोलन ने जनता की बुनियादी समस्याओं को आवाज देने का काम प्रभावी ढंग से करने का प्रयास किया जिसे समाज के हर वर्ग का  समर्थन मिला। लेकिन जो कुछ आगे हुआ, उससे लोगों के  विश्वास को आघात पहुंचना स्वाभाविक था।  

प्रधान मंत्री का यह संकल्प कि न खाऊंगा, न खाने दूंगा  वाकई मौजूदा स्थिति में कितना और कैसा बदलाव सुनिश्चित कर पाते हैं, यह  भविष्य में नेताओं और कार्यकर्ताओं के सम्बन्ध और समीकरण  पर निर्भर करेगा। साथ ही सिद्धांत की राजनीति से प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं -समर्थकों की संख्या में इजाफा भी होगा, ऐसी आशा की जा सकती है। बिहार के लिये यह आवश्यक भी है।  

            और भी बातें करेंगे, चलते-चलते असीम शुभकामनाएं ।

Sunday, September 7, 2014

गुड लाइफ : सफलता-असफलता

                                                                                         - मिलन सिन्हा 

सर्वविदित है कि सफलता -असफलता हमारे जीवन के अभिन्न अंग हैं। शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति  होगा जिसे जीवन में केवल सफलता या फिर केवल  असफलता  मिली हो। इसके अलावे  सफलता -असफलता, छोटी अथवा बड़ी कुछ भी हो सकती है और उसका हमारे जीवन पर असर भी अलग -अलग व्यक्ति के लिये अलग-अलग हो सकता  है। लेकिन, एक बात जो सभी व्यक्तियों में अमूमन समान रूप से देखी जा सकती है, वह है सफलता मिलने पर खुश होना और असफलता मिलने पर मायूस होना। हम यह भी जानते हैं कि कामयाबी  या नाकामयाबी से उत्पन्न भावनात्मक  आवेग की तीव्रता कभी -कभी बड़े जोखिम, यथा ब्रेन स्ट्रोक, दिल का दौरा, अवसाद आदि का सबब भी बन जाते हैं । 

बहरहाल, थोड़ा गहराई से सोचने पर आप भी मानेंगे कि सफलता या असफलता एक सापेक्ष स्थिति है जो उस प्रयोजन के निमित्त हमारे द्वारा किये गए परिश्रम के अलावे अन्य कई बातों पर निर्भर करती है। अगर यह  सच  है तो फिर कामयाबी  हमारे सिर चढ़ कर क्यों बोलती है या नाकामयाबी से हमारा दिल क्यों टूट जाता है ? ऐसा इसलिए कि हम सक्सेस को दिमाग में रख लेते हैं और फेलियर को दिल में।   दरअसल, सफलता कोई सिर पर चढ़ा  कर रखने वाली चीज नहीं है और न ही असफलता कोई दिल में बैठा कर रखने वाली चीज। इसके विपरीत हर छोटी -बड़ी सफलता को दिल से लेना चाहिए  एवं हर असफलता को दिमाग से। असफलता के कारणों का सही विश्लेषण तभी हो पाता है और आगे के लिये बेहतर योजना तथा रणनीति भी तभी बन पाती है। उसी तरह सफलता को दिल से लेने पर हम आनन्दित महसूस करते हैं। आनन्द के उन क्षणों को हम सकारात्मक तरीके से दूसरों के साथ साझा भी हम तभी कर सकते हैं। गुणीजन इन अहम बातों को अच्छी तरह जानते -समझते हैं और तदनुसार सफलता-असफलता दोनों ही स्थितियों में सन्तुलित एवं तनावरहित जीवन जीते हैं। सच कहें तो गुड लाइफ का सार इसी में छिपा है। 

   और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं ।

Friday, September 5, 2014

कमजोर रणनीति से हुए कमजोर

                                                              - मिलन सिन्हा
पिछले लोकसभा चुनाव की बात करें या हाल में सम्पन्न हुए बिहार विधान सभा के उपचुनाव की बात करें, वाम दलों की मौजूदा स्थिति पर कोई चर्चा तक  नहीं होना कुछ अटपटा  लगता है। गरीबी, बीमारी, बेकारी, शोषण ,कुपोषण, अशिक्षा , भूमि विवाद , बाल विवाह,  आर्थिक -सामाजिक असमानता, बाढ़ ,सूखा, भ्रष्टाचार आदि के मामले में बिहार देश के चंद पिछड़े राज्यों में से एक बड़ा और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्य रहा है। गौर करें तो  देश -प्रदेश में  दशकों से यही वामपंथी राजनीति के प्रमुख सैद्धान्तिक मुद्दे  रहे हैं। शायद इन्हीं बातों के चलते अब तक राजधानी पटना की सड़कें और मैदान उनके द्वारा आहूत धरना -प्रदर्शन में सर्वहारा वर्ग के लोगों से भरा दिखता है। बिहार के मतदाताओं में आजादी के 67 साल बाद भी इन्हीं दबे -पिछड़े और जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं से जूझते लोगों की संख्या ज्यादा है। फिर  ऐसा क्या है जो इन वाम दलों - सीपीआई, सीपीएम, सीपीआई(एमएल)  को भारतीय  लोकतंत्र के चुनावी समर में विजयश्री से वंचित रख रहा है ? क्या धरना -प्रदर्शन में दिखने वाली भीड़ चुनाव में भाग लेनेवाली  भीड़ नहीं  है ? क्या बिहार में इन  दलों खासकर सीपीआई और सीपीएम द्वारा अपनायी जाने वाली बदलती रणनीति से इनके समर्थक भी कन्फ्यूज्ड हो गए हैं जिसका फायदा राजद और जदयू जैसे दल उठा रहे हैं ? ये प्रश्न अहम एवं विचारणीय हैं। 

सच पूछिये तो एक लम्बे अरसे से सीपीआई और सीपीएम जैसे अखिल भारतीय पहचान वाले दल बिहार की राजनीति में साम्प्रदायिकता को मुख्य मुद्दा बता कर राजद और कांग्रेस के छोटे पार्टनर की भूमिका, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप, से निभाते रहे हैं। परिणाम स्वरुप ये दल खुद अपनी आंतरिक व वैचारिक ताकत को कम करते गए और अपनी राजनीतिक जमीन से बेदखल हो कर  हाशिये पर चले गए। 1990 के पहले सूबे में भाकपा काफी मजबूत थी, लेकिन बाद में राजद से नजदीकियों के कारण वह कमजोर होती गई।

कहना न होगा, अगर बदली हुई राजनीतिक, सामजिक व आर्थिक परिस्थितियों के मद्देनजर आज भी वामपंथी विचारधारा वाले प्रमुख दल एकजुट हो कर चलने का फैसला कर लें तो कोई कारण नहीं कि वे अगले कुछ वर्षों में एक मजबूत वैकल्पिक राजनीतिक शक्ति बनकर न उभर सकें। 

कई जाने -पहचाने कारणों से बिहार की राजनीति को सार्थक, सशक्त व जीवंत बनाये रखने के लिए यह अनिवार्य भी है। वाम दलों के मजबूत होने से सूबे की राजनीति में गरीब तबकों को आवाज मिलेगी।

    और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं ।

# लोकप्रिय हिंदी दैनिक, 'दैनिक भास्कर' में  प्रकाशित दिनांक :02.09.2014

Sunday, August 31, 2014

अगले कुछ महीने तय करेंगे सूबे की सियासत

                                                                                         - मिलन सिन्हा 
loading...यदयपि वोटिंग प्रतिशत कम होने से सामन्यतः चुनाव  परिणाम के आकलन  व अनुमान गड्डमड्ड हो जाते  हैं, तथापि  बिहार विधानसभा की दस सीटों के लिए हुए उप चुनाव के परिणाम  अनुमान के अनुरूप हैं  क्यों कि ये उपचुनाव स्थानीय मुद्दों और जातीय आधार पर लड़े गए। ऐसे, उम्मीदवारों के व्यक्तिगत प्रभाव एवं दसों सीटों पर हार-जीत के पैटर्न में हुए उलट-पुलट के गहन विश्लेषण के पश्चात हम अनेक दिलचस्प तथ्यों से वाकिफ हो पायेंगे। 

 प्रत्याशा के अनुरूप  दोनों गठबंधन के नेता -प्रवक्ता दलगत आधार पर नतीजों की राजनीतिक व्याख्या कर रहे हैं। फिर भी, सिर्फ परिणामों के सन्दर्भ में कहें तो जहां यह  राजद -जदयू -कांग्रेस महागठबंधन के लिये  हर्ष व उत्साह का विषय है, वहीं भाजपा गठबंधन के लिये चिंतन और चुनौती का । सच तो यह है कि इस उपचुनाव  के जरिये लालू प्रसाद ने  'जो चाहा, वो पाया' का मुकाम हासिल कर लिया। महागठबंधन की राजनीति में आनेवाले दिन इसे साबित करेंगे। 

बहरहाल, अगले वर्ष जब विधान सभा के चुनाव होंगे तब भी परिणाम इसी उपचुनाव के ट्रेंड को दोहरायेंगे, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी ।  कारण करीब एक साल के इस अंतराल में बिहार की राजनीति में, खासकर राजद -जदयू -कांग्रेस महागठबंधन के सन्दर्भ में,   सब कुछ वैसा ही होगा जैसा आज हो रहा है, यह कोई नहीं कह सकता। वैसे भी संभावनाओं के इस अदभुत खेल में उपचुनावों के परिणाम न तो पूरे प्रदेश की जनता के मूड का बैरोमीटर होते हैं और न ही सुदूर भविष्य में होनेवाले विधानसभा या लोकसभा के चुनाव परिणाम के दिशा सूचक। 

भाजपा गठबंधन के लिये यह संतोष का विषय होना चाहिए है कि नरेन्द्र मोदी लहर के बिना, किन्तु तमाम  अंदरुनी  खींचतान   तथा  विपक्षी महागठबंधन में शामिल दलों के  मजबूत जातीय घेराबंदी के बावजूद उन्होंने चार सीटें हासिल कर ली। लेकिन, एक बात तो साफ़ है कि भाजपा गठबंधन के लिये मौजूदा  रणनीति की बुनियाद पर  अगला विधान सभा चुनाव जीतना काफी मुश्किल होगाजो उनका बड़ा लक्ष्य है। 

बिहार की  मौजूदा सरकार के पिछले 100 दिनों के कामकाज को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि अगर यही  सरकार अगले चुनाव तक काबिज रह जाती  है तो कानून व्यवस्था हो या विकास की गति, सरकार का स्कोर कार्ड शायद ही बेहतर  हो पाये। नतीजतन, इसका  नुकसान सत्तारूढ़ दल व महागठबंधन को उठाना पड़ेगा। यह  भाजपा गठबंधन के लिये बोनस होगा। फिर देखने वाली बात यह भी होगी कि अगले कुछेक महीनों में केन्द्र की मोदी सरकार किस तरह काम करती है।  अगर वह स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर दिए गए प्रधानमंत्री के भाषण के अनुरूप कार्य करके दिखा सकें, तो उन अच्छे कार्यों का राजनीतिक व चुनावी लाभ प्रदेश के भाजपा गठबंधन को मिलना स्वाभाविक है। दूसरी ओर अगर चारा घोटाला मामले में आने वाले दिनों में लालू प्रसाद को अदालती फैसलों से लाभ के बदले नुकसान होता है तो इसका दुष्प्रभाव राजद को झेलना पड़ेगा। 

कुल मिला कर आने वाले महीने तमाम राजनीतिक बयानबाजी, आरोप -प्रत्यारोप, आयाराम -गयाराम जैसे दृश्यों के गवाह होंगे। 

   और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं ।

# लोकप्रिय हिंदी दैनिक, 'दैनिक भास्कर' में  प्रकाशित दिनांक :26.08.2014