Sunday, October 28, 2012

औचित्य मंत्रिमंडल विस्तार का

                                                                                     - मिलन सिन्हा 
                 आखिर हो ही गया ममोहन सिंह के बड़े मंत्रिमंडल का चिर प्रतीक्षित बड़ा  विस्तार । कई महीनों  से इसके कयास  लगाये  जा रहे थे, तारीखें   तय होने और बदले जाने की ख़बरें भी  आती रही । विभिन्न टीवी चैनेलों ने इन खबरों से लोगों को बाखबर भी रखा कई  अवसरों पर पिछले दिनों।इस बीच हिमाचल प्रदेश और गुजरात विधानसभाओं के लिए चुनाव  प्रक्रिया शुरू होने के साथ वाड्रा तथा गडकरी पर घोटाले के सनसनीखेज  आरोप लगे  जिससे चर्चाओं को नया मुद्दा भी मिला। हाँ, इसी दौरान  डीजल तथा रसोई गैस के बढ़ी कीमतों ने आम लोगों को महंगाई के डायन से और ज्यादा रूबरू  भी करवाया।

                बहरहाल, चर्चा को आज के मंत्रिमंडल  विस्तार तक  ही सीमित रखें तो विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के लोक को क्या मिला इस राजनीतिक कवायद से - सिर्फ कुछ मंत्रियों के पद छोड़ने, कुछ के प्रोन्नत  होने, कुछ का विभाग बदले जाने, दो-चार नए वफादारों को मंत्री बनाने और इस  सब को अंजाम तक पहुँचाने  के लिए अपनायी  गयी  प्रक्रिया में आम करदाता का कई करोड़ रुपया  जाया  करने के अलावे। याद करिए, पिछले विस्तार प्रक्रिया के पश्चात् यही बातें नहीं कही गयी थी  कि इससे सरकार की कार्यकुशलता बढ़ेगी, विकास को  और गति प्रदान की जा सकेगी आदि, आदि .।

               पर, क्या पिछले  कुछ  महीनों में ऐसा कुछ हुआ या, देश कुछ और बदहाल हुआ? तो फिर इस बार के इस प्रयास से क्या हासिल हो जायेगा? क्या हम इतने बड़े-बड़े मंत्रिमंडल का बोझ उठाने में सक्षम हैं? आइये, जरा इस पर भी सोचें और  विचार करें।

              और भी बातें करेंगे, चलते-चलतेअसीम  शुभकामनाएं

Friday, October 26, 2012

आज की कविता : संकल्प

                                                                                  -मिलन सिन्हा 
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जो है खरा 
झंझावात में भी वही 
रह पायेगा खड़ा .
नहीं दिखेगा वह 
कभी भी डरा-डरा .
कोई भी उसे 
अपने संकल्प से 
नहीं डिगा पायेगा 
पर,
जो खोटा  है 
भले ही मोटा है 
देखने में 
चिकना चुपड़ा  है 
सौन्दर्य प्रसाधनों का 
चलता-फिरता विज्ञापन है,
मुखौटा हटते ही 
उसका असली चेहरा दिखेगा 
तब क्या वह 
किसी के सामने 
बिना  बैसाखियों के 
खड़ा भी रह पायेगा ?

  # प्रवक्ता . कॉम  पर प्रकाशित 

                      और भी बातें करेंगे, चलते-चलते असीम शुभकामनाएं

Wednesday, October 24, 2012

आज की कविता : नया सफ़र

                                                                  - मिलन सिन्हा 
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नया सफ़र 
लगता है जैसे 
वे कर रहे हों एक  तैयारी 
आज शायद उनकी 
आ गयी है बारी 
क्या खोया, क्या पाया 
ठीक से समझ रहे हैं 
गुजरा हुआ एक एक पल 
फिर से जैसे जी रहे हैं 
कभी ख़ुशी,
तो कभी गम के आंसू 
स्वतः निकल रहे हैं 
डाक्टरों ने 
जवाब दे दिया है 
बेतार माध्यम ने 
तुरंत यह खबर 
परिजनों को दे दिया है  
एक एक कर 
सब आने लगे हैं 
पहुँचते ही 
उन्हें छू  कर रोने लगे हैं 
घर भर गया है 
माहौल ग़मगीन
 हो गया है  
आंसू से फर्श तक 
गीला हो गया है 
तभी उनकी 
लड़खड़ाती  आवाज गूंजती है 
काहे  का यह रोना धोना 
हर किसी को तो 
एक-न-एक दिन है जाना 
मैंने तो फिर भी 
खेली है लम्बी पारी 
बस, अब तो 
एक नये सफ़र की है तैयारी  !

# प्रवक्ता . कॉम पर प्रकाशित

                        और भी बातें करेंगे, चलते चलते असीम शुभकामनाएं

Tuesday, October 23, 2012

हास्य व्यंग्य कविता : पॉपुलर कारपोरेट मंत्र

                                                                        -मिलन सिन्हा 
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सुबह से हो जाती थी शाम 
  पर, हर दिन  
रहता था वह  परेशान. 
मामला ओफिशिएल था 
कुछ -कुछ ,
कांफिडेंसिएल  था. 
इसीलिए 
किसी से कुछ न कहता था 
खुद ही चुपचाप , 
 सबकुछ  सहता था. 
देखी  जब मैंने  उसकी दशा 
 सुनी गौर  से 
उसकी समस्या, 
सब कुछ समझ में आ गया .
असल बीमारी का 
पता भी चल गया. 
रोग साइकोलोजिकल  था 
पर, समाधान 
बिल्कुल प्रक्टिकल  था. 
मैंने  उसे सिर्फ़  एक  मंत्र  सिखाया 
जिसे उसने 
बड़े मन से अपनाया. 
आफ़िस  में अब उसे 
नहीं है कोई टेंशन, 
सेलेरी को अब वह 
समझने लगा है पेंशन. 
"झाड़ने " को वह  अब 
"कला " मानता है .
अपने मातहतों  को 
खूब झाड़ता  है. 
और अपने बॉस के फाइरिंग को 
चैम्बर से  निकलते ही 
ठीक से "झाड़ता " है .
"झाड़ने " को वह  अब 
"कला " मानता है I 

# प्रवक्ता . कॉम  पर प्रकाशित 

   और भी बातें करेंगे, चलते-चलते। असीम शुभकामनाएं  

Monday, October 22, 2012

आज की कविता : स्मिति

                                                                        - मिलन  सिन्हा 
एक नन्ही सी लड़की 
मुस्कुराई, 
पेड़ पर  लगे 
फूल को देखकर .
फूल  ने भी किया 
लड़की का अभिवादन 
खिलखिलाकर .
हुए दोनों प्रफुल्लित .
देखकर यह सब 
पेड़ का मन हुआ पुलकित .
फिर,
पेड़ फूलों से भर गया .
विद्वेष की कालिमा लगी मिटने .
सब ओर 
मुस्कुराहट लगी फैलने .
समाज लगा फूलों से सजने .
खुशबुओं से लगा भरने !

प्रवासी दुनिया .कॉम पर प्रकाशित

                       और भी बातें करेंगे, चलते-चलतेअसीम शुभकामनाएं

Saturday, October 20, 2012

दो छोटी कविताएं : देखनेवाले, अक्लवाले

                                                                        - मिलन सिन्हा 
 देखनेवाले
आज 
जो लोग 
उजाले में हैं 
वे 
अंधेरे में पड़े 
लोगों को 
नहीं देख पा रहे हैं .
पर,
अंधेरे में पड़े लोग 
उन्हें  बराबर 
अच्छी तरह
देख रहे हैं !

अक्लवाले 
आज 
लोग 
अक्ल की 
बात 
कल पर 
छोड़  रहे हैं 
लेकिन,
अर्थ की 
बातों को 
अपने स्वार्थ  से 
तुरत 
जोड़  रहे हैं !
                और भी बातें करेंगे, चलते - चलते असीम शुभकमनाएं। 

Friday, October 19, 2012

हास्य व्यंग्य कविता: गांधीवादी परम्परा

                                                                                     * मिलन सिन्हा 
















हमारे  नेता जी काफी चर्चित थे .
जनता से
 जो काम करने को कहते थे 
उसे पहले 
खुद करते थे .
इस  मामले वे अपने को 
पक्के सिद्धान्तवादी-गांधीवादी कहते थे .
एक बार उन्होंने कहा,
हम गरीबी हटाकर रहेंगे 
अब गरीबी रहेगी या 
 हम रहेंगे .
 सिद्धान्त के मुताबिक  उन्होंने पहले 
अपनी गरीबी हटाने का प्रयास किया 
और जल्दी ही 
कई गाड़ियां खरीद लीं, 
चार-पांच मकान  बनवा लिया 
और भी न जाने 
क्या-क्या जोड़ लिया .
इस तरह उन्होंने
एक नयी परम्परा को जन्म दिया 
जिसका अनुसरण करते हुए 
अधिकांश नेता गांधीवादी (?) बन गए 
और पहले 
अपनी-अपनी गरीबी हटाने में जुट गए !
                                       
# प्रवक्ता . कॉम  में प्रकाशित 

                 और भी बातें करेंगे, चलते - चलते असीम शुभकमनाएं

Tuesday, October 16, 2012

वायु प्रदूषण के गंभीर खतरे के बीच हमारा जीवन

                                                                                      - मिलन सिन्हा 
Pollution in New Delhi
   
गाँव छोड़ कर लोग लगातार शहरों में आ रहे हैं।शहरों पर बोझ बढ़  रहा है। शहर में बुनियादी सुविधाएँ पहले  ही नाकाफी थी, अतिरिक्त जनसँख्या के दवाब में तो अब हालत और भी खस्ता हो गई  है। सुबह हो या शाम, घर से बाहर निकल कर सड़क पर आते ही आपको हर छोटे बड़े शहर में सड़कों पर जाम से रूबरू होना पड़ेगा और सडकों  पर गुजारे सारे वक्त में वायु प्रदूषण  के दुष्प्रभावों को झेलना पड़ेगा। हालांकि  वायु प्रदूषण   का प्रकोप सर्वव्यापी है, फिर भी नगरों, महानगरों की हालत गाँव की अपेक्षा बहुत ही गंभीर होती जा रही है दिन-पर-दिन। वायु प्रदूषण  के विभिन्न आयामों पर चर्चा जारी  रखने से पहले आइये इन तथ्यों पर गौर कर लें :
  • चीन के  बाद भारत विश्व का दूसरा आबादीवाला देश है। भारत की आबादी 120 करोड़ से ज्यादा है।
  • भारत में यात्री वाहनों की संख्या चार करोड़ से ज्यादा है।
  • हर साल भारत में 110 लाख वाहन का उत्पादन होता है।
  • भारत विश्व के दस बड़े वाहन उत्पादक देशों में से एक है।
  • हमारे देश में पेट्रोल, डीजल आदि की खपत तेजी से बढ़ रही है।
  • हम अपने खनिज तेल की जरूरतों का 80% आयात करते हैं।
  • वर्ष 2011-12 में   हमने  खनिज तेल  के आयात पर 475 बिलियन डालर  खर्च किया है।
  • कोयले के उत्पादन और खपत में भी लगातार वृद्धि हो रही है।
          उपर्युक्त वर्णित तथ्यों के आधार पर  हम स्वयं ही अनुमान लगा सकते हैं कि हमारी स्थिति कितनी गंभीर होती जा रही है। देश में खनिज तेल जरुरत की तुलना में मात्र 20% है, पर तेल पर चलनेवाले वाहनों  की  संख्या  तेजी से बढती जा रही है।सड़कें छोटी पड़ती जा रही हैं, वायु प्रदूषण  बढ़ता जा रहा है, सड़क दुर्घटनाओं की  संख्या भी निरंतर बढती जा रही है, देश की राजधानी विश्व के कुछ सबसे बड़े प्रदूषित शहरों में शामिल हो गया है, लेकिन किसे इन बातों की फिक्र है? नतीजतन, आज हम सभी निम्नलिखित परिस्थिति से दरपेश हैं:
  • वायु प्रदूषण से  भारत में हर साल 6 लाख से ज्यादा लोग मरते हैं।
  • वायु प्रदूषण से  एक बड़ी आबादी दमा, हृदय रोग, कैंसर , चर्म रोग आदि से ग्रस्त हैं।
  • गर्ववती महिलाएं और पांच साल तक के बच्चे  वायु प्रदूषण से बुरी तरह प्रभावित होते हैं।
  • वायु प्रदूषण के कारण मानव समाज के अलावे पशु-पक्षी एवं वनस्पति तक को गहरी क्षति होती है।
       तो आखिर क्या करें? सिर्फ सरकार द्वारा उठाये जानेवाले क़दमों के भरोसे रहें? या अपनी ओर से अपने वायु मंडल को प्रदूषण  से बचाने  के लिए  नीचे लिखे कार्यों को अंजाम तक पहुँचाने  में बढ़-चढ़ कर भाग लें और सरकार को भी इन्हें सख्ती से लागू करने के लिए  संविधानिक  तरीके से मजबूर करें:
  • सार्वजनिक परिवहन प्रणाली में व्यापक एवं प्रभावी  सुधार।
  • साइकिल चालन को अत्यधिक प्रोत्साहित करना।
  • मौजूदा जंगलों /पेड़ों को संरक्षित करना एवं साथ-साथ बड़े पैमाने पर वनीकरण को बढ़ावा देना।
  • यथासंभव प्राथमिकता के आधार पर सौर  तथा  पवन उर्जा को लोकप्रिय बनाना।
  • उत्सर्जन मानदंडों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करना।
      आशा है, हम समय रहते इस  समस्या से निबटने में एक हद तक कामयाब होंगे।
  # प्रवक्ता . कॉम पर प्रकाशित 

                  और भी बातें करेंगे, चलते-चलते। असीम शुभकामनाएं। 

Sunday, October 14, 2012

चार लघु कविताएं : प्यार, सुख, शिक्षा, बोध

                                                              - मिलन  सिन्हा 
प्यार 
प्यार 
सफल है 
कब?
जब वह 
सीमाबद्ध न रहे 
तब !

सुख 
जिंदगी 
सुखमय है 
कब ?
जब वह 
दूसरे की 
जिंदगी को भी 
सुख से 
भर सके 
तब !

शिक्षा 
शिक्षा 
सार्थक है 
कब ?
जब वह 
आदमी  को 
विनम्र, भद्र  बनाए 
तब !

बोध 
मिलन 
सफल है 
कब ?
जब वह 
दूसरे को 
बिछुड़न  का 
बोध न कराए 
तब ! 

# जीवन साहित्य के अगस्त '85  अंक में प्रकाशित

                  और भी बातें करेंगे, चलते चलते। असीम शुभकामनाएं 

Saturday, October 13, 2012

आज की कविता : आज का मानव

                                                                                - मिलन सिन्हा 
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आज का मानव 
आज 
हरेक के जेब में मानव 
हरेक के पेट में मानव 
पेट से निकला है मानव 
पेट से परेशान  है मानव 
अन्तरिक्ष में क्रीड़ा कर रहा है मानव 
सड़क पर लेटा है मानव 
जोड़ - घटाव में व्यस्त है मानव 
वैरागी बन रहा है मानव 
मशीन बन रहा है मानव 
समुद्र की लहरें गिन रहा है मानव 
महामानव बनाने में जुटा है मानव 
न्यूट्रान बम बना रहा है मानव 
विश्व शांति की बात कर रहा है मानव 
अपने ही घर में रोज  लड़ रहा है मानव 
अच्छी-अच्छी बातें कर रहा है मानव 
बुरे-बुरे काम कर रहा है मानव  
सचमुच,
मानव के अस्तित्व के लिए आज 
परेशानी का सबब बन रहा है मानव  !

प्रवक्ता . कॉम पर प्रकाशित

                  और भी बातें करेंगे, चलते चलते। असीम शुभकामनाएं। 

Thursday, October 11, 2012

आज की कविता : सपनों का गाँव

                                                                               -- मिलन सिन्हा
सपनों  का गाँव
यह गाँव है , सपनों का गाँव है 
हरियाली है, खुशहाली है 
होली है, क्रिसमस है, ईद है, दिवाली है 
पतंग है, उमंग है 
मोहक यहाँ का सब रंग ढंग है 
अपनी धरती, अपना आकाश है 
दूर नहीं, सब आस-पास है
 नदी है, नाव है, धूप  है, छांव है 
फूलों का सुगंध है, धूल-सना पाँव है 
यह गाँव है , सपनों का गाँव है।


अमराई  है, तराई है 

हर चीज अपनी, नहीं कुछ पराई है 
कोयल की कूक है, प्यार की हूक है 
बात मीठी -मीठी, पर दो टूक है 
सम्बन्ध है मधुर, प्रेम है भरपूर 
बुराई है यहाँ से बहुत ही दूर 
गहरा लगाव है, अच्छा स्वभाव है 
पनघट है, नीम की छांव है 
यह गाँव है , सपनों का गाँव है। 


                       और भी बातें करेंगे, चलते चलते। असीम शुभकामनाएं। 


Tuesday, October 9, 2012

गरीबों के लिए आजादी के मायने क्या ?

                                                                                               *  मिलन सिन्हा 
                    पिछले 15 अगस्त को हमने अपना 66वां  स्वतंत्रता दिवस मनाया। बड़े ताम-झाम से मनाया। प्रधान मंत्री से लेकर मुख्य मंत्री  तक सब ने देश/प्रदेश के तरक्की के बारे में विस्तार से लोगों को  बताया, अनेक नए वादे भी किये।  इन  सब  आयोजनों पर करोड़ों का खर्च जनता के नाम गया , विशेष कर उन तीन चौथाई से भी ज्यादा देश की जनता का,  जो आज भी रोटी, कपड़ा, मकान के साथ साथ स्वास्थ्य , शिक्षा और रोजगार की समस्या से बुरी तरह  परेशान है, बेहाल है  -  आजादी के साढ़े छह दशकों  के बाद भी। क्या यह शर्मनाक स्थिति विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र  कहे जानेवाले देश के योजनाकारों, नीति  निर्धारकों और नौकरशाहों को अब भी परेशान  नहीं करती , उन्हें जल्दी कुछ करने को मजबूर नहीं करती ?
                अक्तूबर का महीना  हमारे चार  बड़े नेताओं और देश भक्तों, राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी, लोकनायक जयप्रकाश  नारायण, पूर्व  प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री   तथा  प्रख्यात  समाजवादी जननेता राम मनोहर लोहिया के जन्म दिवस या पुण्य तिथि के साथ जुड़ा है,  जो अपने जीवन काल में सिर्फ  और सिर्फ गरीब,शोषित,दलित जनता के लिए काम करते रहे। तो क्यों न  इस मौके पर हम  अपने सत्तासीन  नेताओं, योजनाकारों, नीति  निर्धारकों आदि से यह पूछें :
  • क्या प्रत्येक भारतीय को रोज दो शाम का भी खाना भी नसीब हो पाता है?  
  • क्या प्रत्येक भारतीय को एक मनुष्य के रूप में रहने लायक कपड़ा उपलब्ध है ?
  • क्या प्रत्येक भारतीय को रहने के लिए अपना मकान नसीब है?
  • क्या प्रत्येक भारतीय को न्यूनतम  स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध है?
  • क्या प्रत्येक भारतीय बच्चे को बुनियादी  स्कूली  शिक्षा उपलब्ध है?
  • क्या प्रत्येक भारतीय  व्यस्क को साल में 180 दिनों का रोजगार भी मिल पाता है?
           इन सभी मौलिक सवालों का जबाव तो बहुत ही निराशाजनक है,फिर भी सत्ता प्रतिष्ठान से सम्बद्ध सारे लोग चीखते हुए कहेंगे कि इन दशकों के दौरान देश ने हर क्षेत्र में प्रगति की है। लेकिन, वही लोग इस तथ्य को नहीं नकार  पाएंगे कि जितने वायदे उन लोगों ने जनता से इन वर्षों  में किया है, उसका दस प्रतिशत  भी वे  पूरा करने में नाकाम रहे।  देखिये, दुष्यंत कुमार क्या कहते हैं :

यहाँ तक आते आते सूख  जाती है कई नदियां 
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा।

          सभी यह मानेंगे कि किसी भी पैमाने से आजादी के ये 65 साल किसी भी देश को अपनी जनता को बुनियादी जरूरतों  से   चिंतामुक्त करके देश को सम्पन्न और शक्तिशाली बनाने के लिए  बहुत लम्बा अरसा होता है। और वह भी तब, जब कि इस  देश में न तो प्राकृतिक संसाधनों की कोई कमी रही है और न तो   मानव  संसाधन की।  तो फिर यह तो साफ़ है कि भारी  गलती हुई - नीति, योजना,कार्यवाही और सबसे  ऊपर नीयत के मामले में। चुनांचे, हम सभी को देश/ प्रदेश  की सरकारों से पूरी गंभीरता से पूछना पड़ेगा कुछ  बुनियादी सवाल और मिल कर बनानी  पड़ेगी एक समावे शी  कार्य योजना जिसे समयबद्ध तरीके से आम जनता की भलाई  के लिए लागू  किया जा  सकें, तभी हम अपने  को एक मायने में आजाद भारत के नागरिक कह सकेंगे।
  
           और भी बातें करेंगे, चलते चलते असीम शुभकामनाएं
                        

Monday, October 8, 2012

आज की कविता : अंतहीन तलाश

                                                                                 -- मिलन सिन्हा
 अंतहीन तलाश 
चारों  ओर  है 
भीड़ ही भीड़
आने  जाने  में भी 
छिल  रहा है शरीर .
मची है भागम भाग 
किसे पड़ी है 
अगर कहीं 
लगी भी हो आग . 
एक दूसरे को धकेलते 
पीछे छोड़ते 
पीछे छूटते भी .
कई बार गिराते 
कई बार गिरते  भी . 
कभी कुचलते 
कभी कुचले जाते भी . 
भाग रहे हैं हम सब 
आसपास के चीजों से, लोगों से 
नहीं कोई मतलब .
चाहे अनचाहे 
और बड़े भीड़ में 
शामिल होने को अभिशप्त .
ऐसे में, 
अपना वजूद तलाशने की बात 
टलती  रहती है 
हर न आनेवाले कल तक 
कौन जाने कब तक ?

# प्रवासी दुनिया .कॉम पर प्रकाशित

                          और भी बातें करेंगे, चलते चलते। असीम शुभकामनाएं।

Saturday, October 6, 2012

हास्य व्यंग्य कविताएं : प्रतियोगिता, क्रिकेट का खेल

                                                                       - मिलन सिन्हा 
प्रतियोगिता 

अगर  ओलम्पिक में 
'घोटाला ' प्रतियोगिता  को 
शामिल किया जाता 
तो निश्चय ही 
हमारे देश, प्रदेश को 
स्वर्ण पदक 
अवश्य मिल जाता !

क्रिकेट का खेल

दादी माँ बाहर घूम रही थी 
और पास ही में रेडियो पर 
क्रिकेट कमेंट्री चल रही थी .
दादी जी ने पूछा मुझसे ,
अरे, यह रेडियो पर 
क्या  हो रहा है?
बतलाया,
भारत -पाकिस्तान के बीच 
क्रिकेट मैच चल रहा है .
तभी कमेंट्रेटर  की आवाज आयी कि  
 गेंद  बल्ले से लग कर 
'गली' में चली गयी .
इतना सुनना था  कि 
दादी माँ  चिल्लाईं ,
कहा, तुम लोग मुझे 
बेवकूफ  मत बनाओ 
क्रिकेट का खेल 
मैदान में हो रहा है या और कहीं 
मुझे सच - सच बतलाओ !

प्रवासी दुनिया .कॉम पर प्रकाशित

       और भी बातें करेंगे, चलते चलते। असीम शुभकामनाएं। 

Tuesday, October 2, 2012

आज की कविता : जवान और किसान

                                                                           * मिलन  सिन्हा                                    
हरा भरा खेत खलिहान 
फिर भी 
निर्धन क्यों हमारे किसान ?
देश में नहीं 
पानी की कमी 
फिर भी 
क्यों रहती है  सूखी 
यहाँ - वहाँ की जमीं ?
जिसे देखना है वो देखें 
किसान जो उपजाता है 
उसका वह क्या पता है ?
देश को खिलानेवाला 
खुद क्यों भूखा रह जाता है ?
कर्ज के बोझ तले 
क्यों खुदकुशी कर लेता है ? 

देश में लाखों नौजवान 
साहसी,शिक्षित और उर्जावान 
छोड़कर अपना घर-वार 
बनते हैं सीमा के पहरेदार . 
गर्मी हो या सर्दी 
आंधी हो या हो तूफान 
करते हैं देश की सेवा 
देकर आपनी जान .
युद्ध हो या हो कोई आपदा 
रहते हैं तैयार 
हमारे जवान सदा सर्वदा . 
पर, क्या इन जवानों का भविष्य 
सुरक्षित रह पाता है?
देश इनको 
पूरा सम्मान दे पाता  है?

कहाँ हैं वे देश के लाल 
जो लाल बहादुर कहलाएं,
जय जवान, जय किसान का 
वह गौरव फिर से लौटाएं .

 प्रवक्ता.कॉम  में प्रकाशित 

(शास्त्रीजी के जन्म दिन के अवसर पर रचित ) 

इस नयी कोशिश में और भी बातें करेंगे, चलते चलते। असीम शुभकामनाएं। 

आज की कविता : जीवन दर्शन

 (बापू के जन्म दिन के अवसर पर)                                         - मिलन  सिन्हा                                    
अपने मन को 
जोड़ो हर जन से . 
न तोड़ो किसी का दिल 
अपने धन से .
मत बनो तंग दिल 
सबके साथ 
रहो घुल मिल .
हों ऐसे विचार 
जो बन सके 
कर्म का आधार .
न बने व्यवहार तुम्हारा 
व्यापार का सामान 
बढ़ेगा तभी 
तुम्हारा मान सम्मान .
रहे चरित्र 
हमेशा पवित्र पावन 
डिगे नहीं कभी 
कैसा भी हो प्रलोभन .
ऐसा हो 
तुम्हारा जीवन 
जो लोगों के लिए  
बने एक उदाहरण .


इस नयी कोशिश में और भी बातें करेंगे, चलते चलतेअसीम शुभकामनाएं।