Friday, June 9, 2017

आज की बात : कौन ज्यादा जरुरी – 500 करोड़ से रांची में एक एलिवेटेड रोड या झारखण्ड के गांवों में 3.33 लाख शौचालय ?

                                                                                 - मिलन  सिन्हा
केन्द्रीय सड़क परिवहन एवं जहाजरानी मंत्री जहां जाते हैं, कुछ न कुछ दे कर आते हैं. अच्छी बात है. आज के अखबार में है कि वे झारखण्ड की राजधानी रांची आये और शहर के एक व्यस्ततम इलाके में एलिवेटेड रोड बनवाने में केन्द्रीय सहायता देने का एलान कर गए. इसमें 500 करोड़ की लागत आयेगी और इस पर जल्द ही काम शुरू किया जाएगा. राज्य सरकार इस एलिवेटेड रोड के निर्माण के लिए केन्द्रीय सहायता की मांग करती रही है.

सोशल मीडिया पर कल से ही इसकी चर्चा शुरू हो गई थी. कुछ लोगों ने इसका स्वागत किया, तो विपक्ष सहित कुछ ने इसे अनावश्यक बताया - बड़े प्रोजेक्ट के साथ बड़े कमीशन के लाभ का जिक्र भी किया.

बहरहाल, एक प्रश्न जो कई लोगों ने उठाई या आगे भी उठाये जायेंगे, वह यह कि जिस सड़क पर लगातार जाम लगने की दुहाई दे कर इस प्रोजेक्ट को लाने की घोषणा हुई, क्या वास्तव में इसकी नितांत आवश्यकता है. ऐसा इसलिए कि झारखण्ड जैसे राज्य में, जहां एक बड़ी आबादी को राज्य के निर्माण के 17 साल बाद भी पीने के पानी तक का अभाव झेलना पड़ता है, सब के लिए शौचालय निर्माण में अभी बहुत काम करना है, प्राइमरी स्कूलों तक में आधारभूत सुविधाओं की कमी बरकरार है, प्राइमरी हेल्थ सेंटर में दवा-डॉक्टर आदि तक की कमी है. इस सन्दर्भ में 500 करोड़ की राशि को राजधानी के एक एलिवेटेड रोड निर्माण में खर्च करना कहाँ तक उचित है. वह भी तब जब कि सरकार और प्रशासन ने उक्त व्यस्ततम रोड के दोनों ओर अतिक्रमित जगह को खाली करवाने, प्राइम टाइम में ट्रैफिक को बेहतर तौर पर रेगुलेट करने, एक दूसरे से जुड़ी दसाधिक गलियों को अतिक्रमण मुक्त कर विकसित करने जैसे तमाम विकल्पों पर शिद्दत से कारवाई तक न की हो.

बेहतर तो यह होगा कि मौजूदा व्यवस्था को ठीक करने की पुरजोर कोशिश लगातार की जाय, उस इलाके के आम लोगों का सहयोग और समर्थन प्राप्त करें, उन्हें जागरूक भी करते रहें, जरुरत हो तो अतिक्रमण हटा कर सड़क चौड़ीकरण करें और इस बीच 500 करोड़ जितनी बड़ी राशि से ग्रामीण इलाकों में विकास के बुनियादी कार्य करें. सोचिये, 500 करोड़ रुपये से रु.15000/- प्रति शौचालय के दर  से करीब 3.33 लाख शौचालय बनाए जा सकते हैं या रु. 10 लाख प्रति स्कूल के हिसाब से 5000 नए विद्यालय भवन बनाए जा सकते हैं  या ...
आम जनता के व्यापक हित में इन बातों पर गौर करना अनिवार्य है, क्यों कि कर और कर्ज से चलने वाली सरकारों को उचित प्राथमिकताएं तो तय करनी ही पड़ेगी.    ( hellmilansinha@gmail.com)
                    और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Wednesday, June 7, 2017

आज की बात : लोगों की मौत और हिंसक प्रदर्शन से आगे क्या ?

              -  मिलन सिन्हा
आज अखबार का हेड लाइन देखकर मन दुखी हो गया. मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले में प्रदर्शनकारी भीड़ पर फायरिंग से पांच किसान भाइयों के मरने की खबर थी. कहा जा रहा है कि उसके प्रतिक्रिया स्वरुप प्रदेश के कई अन्य भागों में भी हिंसक वारदातें हुई, लूटपाट, आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाएं हुई.

जब भी कहीं किसी का असामयिक निधन होता है, तो अनायास ही उनके परिजनों का रोता-बिलखता चेहरा सामने आ जाता है. कुछ देर पहले जो व्यक्ति जीवित था, सक्रिय था, जिसके ऊपर कई पारिवारिक-सामाजिक जिम्मेदारी थी, जिसके कई सपने थे, कई लक्ष्य थे, एकाएक गुजर गया. यह सोचना भी मुश्किल होता है. लेकिन ऐसा हुआ और ऐसा कारण-अकारण होता रहता है कभी इस प्रदेश में तो कभी उस प्रदेश में.

ऐसे हमारे देश में सिर्फ ह्रदय रोग से हर दिन आठ हजार से ज्यादा लोग मरते हैं, न जाने कितने और लोग भूख से और अन्य अनेक रोगों से रोज दुनिया से उठ जाते हैं. लेकिन ऐसे सभी  व्यक्ति के मरने पर ट्रक, बस, कार में भीड़ द्वारा आग नहीं लगाईं जाती, तोड़फोड़ नहीं किये जाते, उपद्रव नहीं मचाये जाते, सड़क जाम नहीं किये जाते. होना भी नहीं चाहिए, क्यों कि समस्या है तो मिल-बैठकर समाधान ढूंढना बेहतर तरीका है. नहीं तो पूरा देश ही हर समय उपद्रवग्रस्त रहेगा, कितने और लोग परेशान होंगे, शायद कुछ और निर्दोष लोग ऐसे उपद्रव में मारे भी जायेंगे. संपत्ति की अनावश्यक हानि होगी, सो अलग

जरा सोचिये, समाज में अशांति फैलाने के लिए पेड उपद्रवियों (यानि पैसे के लिए कुछ भी करेगा टाइप उपद्रवीऔर उनके पीछे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से खड़े कतिपय राजनीतिक नेताओं को छोड़ कर ऐसा असामाजिक कृत्य कोई कैसे कर सकता है. फिर सोचने वाली बात यह भी है कि सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने से आम कर दाताओं का ही जेब ढीला होता है. ट्रक, बस आदि जलाने से बीमा कंपनियों द्वारा क्षति का भुगतान करना पड़ता है, जो प्रकारांतर से हमें और देश को आर्थिक नुकसान पहुंचाता है. ऐसे भी, कुछ लोगों के गैरकानूनी हरकतों के कारण हजारोंलाखों लोग आए दिन क्यों बेवजह मुसीबत झेलें.

लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शित करने के सैंकड़ों प्रभावी तरीके हैं जो हिंसक नहीं हैं और देश को हानि पहुंचाने वाले भी नहीं. अहिंसा के पुजारी और सत्याग्रह के प्रबलतम पक्षधर राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के देश में यह कौन नहीं जानता

तो क्या अब समय नहीं आ गया है कि देश भर में प्रशासन निष्पक्ष तरीके से ऐसे पेशेवर उपद्रवियों, उनको शह देने वाले नेताओं और ऐसे मौके पर अफवाह फैलाने वाले तत्वों की स्पष्ट पहचान करे और उन्हें कानून के मुताबिक़ यथाशीघ्र कठोर सजा दिलवाने की ठोस पहल करे.

कहने की जरुरत नहीं कि सभी दलों के अच्छे नेताओं को ऐसी किसी भी स्थिति से तीव्रता से निबटने के लिए प्रदेश सरकार के साथ मिलकर काम करना ही होगा. हां, आंदोलित भीड़ से निबटने के लिए पुलिस को और ज्यादा समर्थ, धैर्यवान एवं संवेदनशील बनाने की जरुरत तो है ही. उन्हें इस दिशा में निरंतर मोटिवेट करते रहने की भी जरुरत है.
                                                                                              ( hellmilansinha@gmail.com)
                 और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं
# प्रवक्ता . कॉम पर प्रकाशित

Tuesday, June 6, 2017

आज की बात : बारिश और बचपन

                                                             - मिलन  सिन्हा 
दो दिनों की गर्मी के बाद आज सुबह से ही कुछ अच्छा होने का आभास हो रहा था. कहते हैं कि प्रकृति विज्ञानी तो पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों की हरकतों से जान जाते हैं कि प्रकृति आज कौन-सा रंग दिखाने वाली है. बहरहाल, अपराह्न एक बजे के बाद से तेज हवा चलने लगी, बादल आने-जाने लगे और बस बारिश शुरू हुई तो एकदम झमाझम. बालकनी से घर के सामने और बगल में फैले आम, नीम, यूकलिप्ट्स, सहजन, अमरुद आदि के पेड़ों को बारिश में बेख़ौफ़ हंसते-झूमते देख कर बहुत ही अच्छा लग रहा था. सामने की भीड़ वाली सड़क पर अभी इक्के-दुक्के लोग छाता सहित या रहित आ-जा रहे थे. सड़क किनारे नाले में पानी का बहाव तेज हो गया था, पर सड़क पर कहीं बच्चे नजर नहीं आ रहे थे. इसी सोच-विचार में पता नहीं कब अतीत ने घेर लिया. 

बचपन में बारिश हो और हम जैसे बच्चे घर में बैठे रहें, नामुमकिन था. किसी न किसी बहाने बाहर जाना था, बारिश की ठंडी फुहारों का आनन्द लेते हुए न जाने क्या-क्या करना था. हां, पहले से बना कर रक्खे विभिन्न साइज के कागज़ के नाव को बारिश के बहते पानी में चलाना और पानी में छप-छपाक करना सभी बच्चों का पसंदीदा शगल था. नाव को तेजी से भागते हुए देखने के लिए उसे नाले में तेज गति से बहते पानी में डालने में भी हमें कोई गुरेज नहीं होता था. फिर उस नाव के साथ-साथ घर से कितनी दूर चलते जाते, अक्सर इसका होश भी नहीं होता और न ही रहती यह फ़िक्र कि घर लौटने पर मां कितना बिगड़ेगी.... अनायास ही गुनगुना उठता हूँ, ‘बचपन के दिन भी क्या दिन थे ... ... ...’  

आकाश में बिजली चमकी और गड़गड़ाहट हुई तो वर्तमान में लौट आया. यहाँ तो कोई भी बच्चा बारिश का आनंद लेते नहीं दिख रहा है, न कोई कागज़ के नाव को बहते पानी में तैराते हुए. क्या आजकल बच्चे बारिश का आनंद नहीं लेना चाहते या हम इस या उस आशंका से उन्हें इस अपूर्व अनुभव से वंचित कर रहे हैं या आधुनिक दिखने-दिखाने के चक्कर में बच्चों से उनका बचपन छीन रहे हैं. शायद किसी सर्वे से पता चले कि महानगर और बड़े शहरों में सम्पन्नता में रहने वाले और बड़े स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के लिए कहीं उनके अभिभावकों ने इसे अवांछनीय तो घोषित नहीं कर रखा है. चलिए, अच्छी बात है कि गांवों तथा कस्बों के आम बच्चे प्रकृति से अब तक जुड़े हुए हैं और इसका बहुआयामी फायदा पा रहे हैं. बरबस याद आ जाती है सर्वेश्वरदयाल सक्सेना  की ये पंक्तियां :
मेघ आए 
बड़े बन ठन के सँवर के.

आगे-आगे नाचती-गाती बयार चली,
दरवाज़े खिड़कियाँ खुलने लगीं गली-गली,
पाहुन ज्यों आए हों गाँव में शहर के

मेघ आए 
            बडे बन-ठन के सँवर के. ... ...

विचारणीय प्रश्न है कि हम जाने-अनजाने अपने बच्चों को प्रकृति के अप्रतिम रूपों को देखने-महसूसने से क्यों वंचित कर रहे हैं, उन्हें कृत्रिमता के आगोश में क्यों धकेल रहे हैं?  
  
हां, एक और बात. कहा जाता है कि बारिश में स्नान करने से घमौरियां ख़त्म हो जाती हैं, किसी तरह के कूल-कूल पाउडर की जरुरत नहीं होती. हमने तो ऐसा पाया है. क्या आपने भी ?
                                                                                            ( hellmilansinha@gmail.com)

                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Monday, May 29, 2017

मोटिवेशन : सफलता और असफलता जीवन का एक हिस्सा है

                                                                      -मिलन सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर 
सीबीएसई 12वीं के परीक्षार्थियों की प्रतीक्षा ख़त्म हो गई.  रिजल्ट की घोषणा हो चुकी.  स्वभाविक रूप से  कुछ बच्चे खुश हैं, तो कुछ बच्चे नाखुश. माता-पिता, शिक्षक, अभिभावक के लिए भी कहीं खुशी और कहीं गम का माहौल है. जिन बच्चों का रिजल्ट अच्छा नहीं हुआ, वे तो स्वयं मायूस, परेशान और तनाव ग्रस्त होंगे. सोच-विचार कर रहे होंगे कि अपेक्षित मार्क्स क्यों नहीं आये, कहां चूक हो गई, अभिभावक और शिक्षक क्या सोचेंगे, लोग क्या कहेंगे, आगे कहां और क्या पढ़ पायेंगे आदि. बावजूद इसके ज्यादातर अभिभावक अपने ऐसे मायूस बच्चों को पीटने-डांटने-कोसने से बाज नहीं आते हैं, जब कि वे भी जानते हैं कि बच्चे पर इसका नकारात्मक असर होगा और यह भी कि इससे बच्चे के इस रिजल्ट में कोई बदलाव नहीं होने वाला है. जो होना था, हो गया है. अब तो इसे खुले मन से स्वीकारने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं. 

बेहतर ये होता है कि ऐसे मौके पर अभिभावक अपने-अपने बच्चे के साथ भावनात्मक रूप से खड़े रहें और दिखें भी. उन्हें प्यार करें; उनकी क्षमता पर भरोसा जताएं. एक काम और करें. ऐसे समय में  'पर-पीड़ा सुख' पाने के इच्छुक ऐसे सभी पड़ोसी और सगे-संबंधी से बच्चों को बचा कर रखना अनिवार्य है. बच्चों को भी गम के दरिया में डुबकियां लगाने, अंधेरे कमरे  में बैठ कर खुद को कोसने और अपने दोस्तों के रिजल्ट से तुलना करने और  दूसरे को दोष देने  के बजाय 'टेक-इट-इजी'  सिद्धांत  का पालन करते हुए शांत रहने की कोशिश करनी चाहिए. 

जीवन से बड़ा कुछ भी नहीं. यह जीवन अनमोल है. अब्राहम लिंकन, महात्मा गांधी, अल्बर्ट आइंस्टीन एवं  ए पी जे अब्दुल कलाम सहित अनेकानेक महान लोगों की जिंदगी असफलताओं के बीच से होकर अकल्पनीय सफलता-उपलब्धि हासिल करने की कहानी कहता है. ऐसे भी, हम सभी जानते हैं कि सफलता-असफलता सभी के जीवन में आते रहते हैं. बेहतर उपलब्धि के लिए सतत कोशिश करते रहना ज्यादा महत्वपूर्ण होता है. 

हां, अब तो अपने देश में 12वीं के बाद बहुत सारे रोजगार उन्मुखी कोर्स शुरू हो गए हैं. सोच-समझ कर दाखिला लेने से भविष्य में कई फायदे होंगे.   

ऐसे, रिजल्ट खराब अथवा आशा के अनुरूप नहीं होने के एक नहीं, अनेक कारण हो सकते हैं.  किसी भी कारण से इस बार अगर अपेक्षित परिणाम नहीं मिले, तो उन कारणों की गहन समीक्षा खुले मन और ठंढे दिमाग से अर्थात निरपेक्ष भाव से तीन-चार  दिनों के बाद करनी चाहिए, तुरन्त तो कदापि  नहीं. 

तो अगले दो दिनों तक क्या करें ? पहला तो, अपने रिजल्ट को पूरी तरह स्वीकार करें. दूसरा, किसी के भी डांट- फटकार, कटाक्ष, आलोचना, व्यंग्य आदि को दिल से न लें. तीसरा, अच्छे से स्नान कर पसंदीदा ड्रेस पहनकर आईने के सामने जाकर मुस्कुराएं और खुद को देर तक निहारते हुए मन ही मन दोहरायें - जो हुआ, ठीक ही हुआ. मैंने जैसी परीक्षा दी, परिणाम कमोबेश उसी के अनुरूप आया. ऐसे भी, मुझे जीवन में अनेक छोटी -बड़ी परीक्षाएं देनी हैं, सफलता-असफलता के अलग-अलग दौर से गुजरना है, तो अब मायूसी किस बात की. पीछे कोई भूल  हुई है तो उसे आगे नहीं दोहराएंगे, खूब मेहनत करेंगे. आगे हम जरुर  कामयाब होंगे, मन में है मेरे यह विश्वास....मन हल्का हो जायगा, हैप्पी-हैप्पी फील होगा. माता-पिता सहित घर के सभी बड़ों का आशीर्वाद  लें और उन्हें आगे बेहतर रिजल्ट का आश्वासन दें. फिर खुशी -खुशी खाना खाएं, टीवी में कॉमेडी शो या फिल्म देखें और रात में जल्दी सो जाएं. यकीन मानिए, आपका कल आज से जरुर बेहतर होगा. आप सफल तो होंगे ही, स्वस्थ भी रहेंगे और आनंदित भी.     
                                                                                       ( hellmilansinha@gmail.com)
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Tuesday, April 25, 2017

मोटिवेशन: खुद पर भरोसा रखें; खुद से प्यार करें

                                         -  मिलन  सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर...
क्या हम वाकई खुद से प्यार करते हैं ?  एक हिन्दी फिल्म के गाने का मुखड़ा है, प्यार बांटते चलो ... ...सही है. हम नफरत क्यों बांटे, खुद को और अपने समाज को गन्दा क्यों करें; कमजोर क्यों करें ? लेकिन अपने पास प्यार की पूंजी होगी, तभी तो हम बाटेंगे न, क्यों ? क्रिस्टिना पेरी का कहना है, ‘यह जरुरी है कि आप खुद से सौ फीसदी प्यार करें, तभी आप किसी दूसरे को प्यार कर सकते हैं.’

सुबह उठते ही हम सभी अपने –आप को आईने में देखना पसंद करते हैं. देखें, जरुर देखें, पर सिर्फ एक पल के लिए नहीं, बल्कि थोड़ा  रुकें और खुद को गौर से देखते हुए सवाल पूछें कि क्या मुझसे बेहतर मुझे कोई और जानता है या जान भी सकता है ? क्या मै इस संसार में यूँ ही आया हूँ और ऐसे ही एक दिन यहाँ से चला भी जाऊँगा; या कि मेरा भी जन्म एक दिव्य शक्ति के साथ हुआ है; मेरे अन्दर भी असीमित क्षमता है बहुत कुछ अच्छा करने के लिए - जिससे मेरा हित हो और मेरे समाज का भी ? क्या मैं आज को बीते हुए कल से थोड़ा बेहतर बनाने का प्रयास नहीं कर सकता ? 

यकीनन, आपको सकारात्मक उत्तर मिलेगा. और तब एक छोटे से मुस्कान के साथ खुद को सिर्फ गुड मॉर्निंग नहीं, वेरी गुड मॉर्निंग कहें. तत्पश्चात मन ही मन जोर से बोलें, हाँ, मैं कर सकता हूँ और जरुर करूँगा. करके देखिए, बहुत अच्छा लगेगा. आपको  एक अनोखी-सी वेलनेस की फीलिंग महसूस होगी. आप खुद को थोड़ा ज्यादा उत्साहित व उर्जावान पायेंगे और आपका दिन बेहतर गुजरेगा. ऐसे भी अंग्रेजी में कहते हैं, ‘मॉर्निंग शोज दि डे’  और यह भी कि ‘वेल बिगन इज हाफ डन’   

इतिहास गवाह है कि महान व्यक्तियों की जिन्दगी इन्हीं बातों को जानते-समझते हुए कार्य करते रहने और रोज खुद को उन्नत करते जाने की यात्रा रही है. उन्होंने खुद से प्यार करना सीखा और विपरीत परिस्थिति में भी खुद पर भरोसा कम नहीं होने दिया. असफलता के दौर में भी उन्होंने खुद से प्यार करना नहीं छोड़ा, अपितु उन पलों में वे आलोचना, आरोप, अपशब्द आदि से अविचलित रह कर अपने से और ज्यादा जुड़े,  अपने को एक सच्चे दोस्त की भांति संभाला और  खुद की हौसला आफजाई भी की. 

हाँ, यह सही है कि  खुद को  रोज उन्नत करते जाना, खुद अपने साथ हर परिस्थिति में मजबूती से खड़े रहना आसान नहीं है, लेकिन यह नामुमकिन भी नहीं है. तभी तो राष्ट्र कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ कहते है, 

“ खम ठोक ठेलता है जब नर, पर्वत के जाते पांव उखड़; 
मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है ....” 

हम सभी जानते हैं कि कुछ पाने के लिए कुछ करना पड़ता है. अतः दिन की शुरुआत आशा और उत्साह के साथ करें ; संकल्प और पूरे सामर्थ्य के साथ करें. सुबह का एक घंटा खुद पर इन्वेस्ट करें – खुद को शारीरिक एवं मानसिक रूप से पूर्णतः तैयार करने के लिए. लेकिन सवाल है, यह सब कैसे करें ? 60 मिनट को तीन हिस्से में बांट लें. सुबह जागने के बाद पहले बीस मिनट में शौच आदि से निवृत हो लें. फिर अगले चरण में शरीर की जड़ता को, जो रात भर सोने के कारण स्वभाविक रूप से महसूस होती है, सामान्य व्यायाम अथवा पवनमुक्तासन से दूर करें. तत्पश्चात अगले बीस मिनट में प्राणायाम और ध्यान का निष्ठापूर्वक अभ्यास कर लें. नियमित रूप से सुबह के इस एक घंटे का आस्थापूर्वक सदुपयोग करने पर आप जल्द ही खुद को काफी बेहतर अवस्था में पायेंगे. रोजमर्रा के जीवन में समस्याओं को देखने एवं उनसे निबटने का आपका नजरिया ज्यादा सकारात्मक होता जाएगा और समाधान तक पहुंचना आसान  भी. इससे आपके कार्यक्षमता में वृद्धि होगी तथा आपकी उत्पादकता में गुणात्मक सुधार भी. परिणाम स्वरुप अव्वल तो आप और ज्यादा अच्छा महसूस करेंगे, दूसरे खुद से और ज्यादा प्यार करने लगेंगे और खुद पर आपका भरोसा और सुदृढ़ होगा. और तब आप अनायास ही गुनगुना उठेंगे : 

हम हैं राही प्यार के ... या यह कविता भी : हममें  भी है दम, बढ़ चले अब हमारे भी कदम ...

                  और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 

# बैंक ऑफ़ इंडिया की गृह पत्रिका "तारांगण" के दिसम्बर'16 अंक में प्रकाशित 

Monday, March 13, 2017

बातों-बातों में : होली के मौके पर थोड़ी तुकबंदी (सन्दर्भ : उत्तर प्रदेश चुनाव-2017)

                                                                        - मिलन  सिन्हा 

सब कुछ हो गया शांत,
थम गया चुनाव का शोर. 
ढूंढें जरा,कहाँ छुपे हैं पीके,
सबके चहेते प्रशांत किशोर. 

जानना चाहते है सभी यूपीवासी,  
पीके ने ऐसा करतब कैसे कर दिखाया?
साइकिल पर सवार दो युवाओं को 
कैसे हार के गर्त में पहुंचाया?

.....होली की असीम शुभकामनाएं.


                   और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 

Saturday, March 11, 2017

बातों-बातों में : उत्तर प्रदेश चुनाव-2017 के नतीजे

                                                                                          - मिलन सिन्हा 
उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों के चुनाव परिणाम आ गए. सुबह से देश-प्रदेश के ढेर सारे न्यूज़ चैनल्स (मूलतः राजनीतिक न्यूज़ को समर्पित) लगातार रुझान और फिर परिणाम पर घनघोर चर्चा कर रहे हैं, नेताओं -पत्रकारों के विचार ले रहे हैं. यह सिलसिला अभी जारी रहेगा, कुछ कम -ज्यादा तीव्रता के साथ जब तक इन राज्यों में नई सरकार स्थापित नहीं हो जाती.

दीगर बात है कि चुनाव परिणाम आने से पहले तक सभी बड़ी पार्टियां अपने-अपने जीत का दवा करती हैं. फिर चुनाव परिणाम आने के बाद हार -जीत के हिसाब से उनके नेताओं का बयान -स्पष्टीकरण भी आ जाता है - ज्यादातर तर्क व तथ्य से परे. एक-दो बानगी देखिए:

22 करोड़ की आबादी वाले देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के 403 सीटों में से भाजपा ने 312 सीटों पर विजय प्राप्त की है, लेकिन बसपा की नेता मायावती जी कहती हैं कि ऐसा इवीएम (वोटिंग मशीन) में छेड़छाड़ करके किया गया यानी उत्तर प्रदेश की सपा सरकार और उनके अधीन काम करने वाला प्रशासन सत्तारूढ़ पार्टी और बसपा को चुनाव में हराने के लिए वोटिंग मशीन के साथ छेड़छाड़ करता रहा और खुद मुख्यमंत्री तथा निर्वाचन आयोग मूक दर्शक बना रहा..... 

2. सपा सरकार और निवर्तमान मुख्यमंत्री और सपा अध्यक्ष अखिलेश जी कहते है कि प्रदेश के मतदाता बहकावे में आ गए यानी कल तक जो मतदाता समझदार था, "हाथ" से हाथ मिला रहा था और "साइकिल" की सवारी करने को प्रतिबद्ध था, मतदान के दिन बहक गया, नासमझ हो गया. ...

उत्तर प्रदेश में चुनाव की तारीखों की घोषणा के बाद से आज सुबह तक सोशल मीडिया या न्यूज़ चैनल्स या समाचार पत्रों में आये ज्यादातर हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकारों व संपादकों (कुछ पूर्व संपादकों जो अपने अतीतगान में लगे रहते हैं, सोशल मीडिया पर रोज न जाने क्या-क्या लिखते रहते हैं) के विचारों-रपटों पर गौर कर लें, तो आपको उनके Intellectual dishonesty का अंदाजा लग जाएगा. शायद यही कारण रहा कि पूरे उत्तर प्रदेश का दौरा करने व वहां के मतदाताओं का मिजाज समझने का दावा करने के बावजूद ये लोग भाजपा के इस अभूतपूर्व जीत का संकेत तक नहीं दे पाए. ऐसे लोग खुद को समाचार जगत के नामचीन प्रतिनिधि तो बताते रहते हैं, लेकिन क्या इनका आचरण सम-आचार के बुनियादी सिद्धांत के अनुरूप है ? Either they fail to see the obvious or reporting otherwise even by seeing the truth or knowing the real fact.

इसे आप क्या कहेंगे ?

अंत में एक  छोटा-सा तथ्य आपके विचारार्थ व आपके निरपेक्ष मंतव्य हेतु : 
इन पांच राज्यों में हुए चुनाव में कुल 690 सीटों, जिसमें अकेले उत्तर प्रदेश में 403 हैं, के लिए चुनाव हुए और इनमें  से सिर्फ भाजपा ने अकेले करीब 406 सीटों (58 .84%) पर जीत हासिल की, जब कि भाजपा ने सभी 690 सीटों पर चुनाव नहीं लड़े. एक बात और. पहले भाजपा को इन राज्यों में  मात्र 110 सीटें हासिल थी. 

....इसे आप किसी भी पार्टी के लिए कैसी उपलब्धि मानते हैं? 


                  और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं