Monday, March 13, 2017

बातों-बातों में : होली के मौके पर थोड़ी तुकबंदी (सन्दर्भ : उत्तर प्रदेश चुनाव-2017)

                                                                        - मिलन  सिन्हा 

सब कुछ हो गया शांत,
थम गया चुनाव का शोर. 
ढूंढें जरा,कहाँ छुपे हैं पीके,
सबके चहेते प्रशांत किशोर. 

जानना चाहते है सभी यूपीवासी,  
पीके ने ऐसा करतब कैसे कर दिखाया?
साइकिल पर सवार दो युवाओं को 
कैसे हार के गर्त में पहुंचाया?

.....होली की असीम शुभकामनाएं.


                   और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 

Saturday, March 11, 2017

बातों-बातों में : उत्तर प्रदेश चुनाव-2017 के नतीजे

                                                                                          - मिलन सिन्हा 
उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों के चुनाव परिणाम आ गए. सुबह से देश-प्रदेश के ढेर सारे न्यूज़ चैनल्स (मूलतः राजनीतिक न्यूज़ को समर्पित) लगातार रुझान और फिर परिणाम पर घनघोर चर्चा कर रहे हैं, नेताओं -पत्रकारों के विचार ले रहे हैं. यह सिलसिला अभी जारी रहेगा, कुछ कम -ज्यादा तीव्रता के साथ जब तक इन राज्यों में नई सरकार स्थापित नहीं हो जाती.

दीगर बात है कि चुनाव परिणाम आने से पहले तक सभी बड़ी पार्टियां अपने-अपने जीत का दवा करती हैं. फिर चुनाव परिणाम आने के बाद हार -जीत के हिसाब से उनके नेताओं का बयान -स्पष्टीकरण भी आ जाता है - ज्यादातर तर्क व तथ्य से परे. एक-दो बानगी देखिए:

22 करोड़ की आबादी वाले देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के 403 सीटों में से भाजपा ने 312 सीटों पर विजय प्राप्त की है, लेकिन बसपा की नेता मायावती जी कहती हैं कि ऐसा इवीएम (वोटिंग मशीन) में छेड़छाड़ करके किया गया यानी उत्तर प्रदेश की सपा सरकार और उनके अधीन काम करने वाला प्रशासन सत्तारूढ़ पार्टी और बसपा को चुनाव में हराने के लिए वोटिंग मशीन के साथ छेड़छाड़ करता रहा और खुद मुख्यमंत्री तथा निर्वाचन आयोग मूक दर्शक बना रहा..... 

2. सपा सरकार और निवर्तमान मुख्यमंत्री और सपा अध्यक्ष अखिलेश जी कहते है कि प्रदेश के मतदाता बहकावे में आ गए यानी कल तक जो मतदाता समझदार था, "हाथ" से हाथ मिला रहा था और "साइकिल" की सवारी करने को प्रतिबद्ध था, मतदान के दिन बहक गया, नासमझ हो गया. ...

उत्तर प्रदेश में चुनाव की तारीखों की घोषणा के बाद से आज सुबह तक सोशल मीडिया या न्यूज़ चैनल्स या समाचार पत्रों में आये ज्यादातर हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकारों व संपादकों (कुछ पूर्व संपादकों जो अपने अतीतगान में लगे रहते हैं, सोशल मीडिया पर रोज न जाने क्या-क्या लिखते रहते हैं) के विचारों-रपटों पर गौर कर लें, तो आपको उनके Intellectual dishonesty का अंदाजा लग जाएगा. शायद यही कारण रहा कि पूरे उत्तर प्रदेश का दौरा करने व वहां के मतदाताओं का मिजाज समझने का दावा करने के बावजूद ये लोग भाजपा के इस अभूतपूर्व जीत का संकेत तक नहीं दे पाए. ऐसे लोग खुद को समाचार जगत के नामचीन प्रतिनिधि तो बताते रहते हैं, लेकिन क्या इनका आचरण सम-आचार के बुनियादी सिद्धांत के अनुरूप है ? Either they fail to see the obvious or reporting otherwise even by seeing the truth or knowing the real fact.

इसे आप क्या कहेंगे ?

अंत में एक  छोटा-सा तथ्य आपके विचारार्थ व आपके निरपेक्ष मंतव्य हेतु : 
इन पांच राज्यों में हुए चुनाव में कुल 690 सीटों, जिसमें अकेले उत्तर प्रदेश में 403 हैं, के लिए चुनाव हुए और इनमें  से सिर्फ भाजपा ने अकेले करीब 406 सीटों (58 .84%) पर जीत हासिल की, जब कि भाजपा ने सभी 690 सीटों पर चुनाव नहीं लड़े. एक बात और. पहले भाजपा को इन राज्यों में  मात्र 110 सीटें हासिल थी. 

....इसे आप किसी भी पार्टी के लिए कैसी उपलब्धि मानते हैं? 


                  और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 

Wednesday, March 8, 2017

बातों-बातों में : पांच राज्यों में चुनाव के बहाने कुछ सवाल

                                                                                        - मिलन सिन्हा 
पांच राज्यों के चुनाव में अंतिम दौर का मतदान आज समाप्त हो गया. चुनाव परिणाम 11 मार्च को आयेंगे. कल से टीवी चैनल नतीजों का आकलन एवं भविष्यवाणी करने लगेंगे. चर्चा में भाग लेनेवाले राजनीतिक दलों के अधिकांश प्रवक्ता तो तथ्यों व प्रमाणित आंकड़ों तक को झुठलाते हुए पार्टी लाइन पर बोलते कम, चीखते-चिल्लाते ज्यादा नजर आयेंगे, उनके साथ पैनल में बैठे ज्यादातर पत्रकार-संपादक भी पूर्वाग्रह से प्रेरित बातें करते स्पष्ट नजर आयेंगे. एंकर तो ऐसे भी कार्यक्रम के लिए पहले से तय एजेंडे पर बने रहकर अपनी-अपनी नौकरी कर रहे होंगे. कमोबेश हर राष्ट्रीय हिन्दी-अंग्रेजी चैनल का यही हाल रहता है, रहेगा. 

कहने का सबब यह कि वहां अपना ज्यादा  वक्त लगाना मेरे लिए संभव नहीं होता. मेरी तो कोशिश होगी कि इन चुनावों के जरिए अपने देश एवं समाज के मौजूदा हालात और भविष्य की संभावनाओं पर विचार-विमर्श के लिए थोड़ा ज्यादा समय दे सकूं, कुछ सवालों का उत्तर तलाश सकूं. बहरहाल, चलिए देखते हैं कि इन पांच राज्यों में मतदान प्रतिशत कैसा रहा:

1. मणिपुर - 86 %
2. गोवा - 83 %
3. पंजाब - 77 %
4. उत्तराखंड - 66 %
5. उत्तर प्रदेश - 61 % 
  • हाँ, तो मतदान का यह प्रतिशत क्या दर्शाता है ? 
  • किस राज्य के लोग अपने मताधिकार के प्रति ज्यादा जागरूक और तत्पर हैं ? 
  • कहाँ के लोग लोकतंत्र के सच्चे सिपाही हैं? मणिपुर और गोवा या उत्तराखंड एवं उत्तर प्रदेश ? 
  • इसका उत्तराखंड एवं उत्तर प्रदेश जैसे प्रदेशों के पिछड़ेपन और इन राज्यों (पंजाब भी) में सदियों से फलते-फूलते भ्रष्टाचार से कोई लेना -देना भी है क्या ?
  • क्या मतदान के प्रतिशत का उन प्रदेशों के शिक्षा-साक्षरता, आम आदमी के सामान्य जीवन स्तर से कोई सीधा संबंध है?
  • 14 % (मणिपुर) से लेकर 39 % (उत्तर प्रदेश) वोट न देनेवाले लोगों को मतदान के लिए प्रेरित करने हेतु चुनाव आयोग सहित वहां की मुख्य राजनीतिक दलों की क्या भूमिका रही ?      

ज्ञातव्य  है कि 2015 के बिहार विधान सभा चुनाव में मतदान का प्रतिशत केवल 57% था, जब कि देश के लगभग सारे पत्रकार व राजनीतिक नेता बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों की राजनीतिक समझ और जागरूकता का बखान करते नहीं थकते. आखिर ऐसा क्यों होता है ? 

....देश के समाज विज्ञानी और चुनाव आयोग के विशेषज्ञ इसे कैसे देखते हैं ?
....क्या कल यह विषय न्यूज़ चैनल पर बहस का बड़ा मुद्दा बनेगा?
....और आप का क्या कहना है?

                  और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 

Sunday, February 19, 2017

यात्रा के रंग : ‘श्री जगन्नाथ मंदिर’ और उसके आसपास-2

                                                                                          - मिलन सिन्हा 
हमें पुरी के “श्री जगन्नाथ मंदिर” में प्रवेश करते ही एक पंडा जी मिल गए, जो हमें मंदिर के सभी महत्वपूर्ण भागों में न केवल ले गए, बल्कि उसके धार्मिक-आध्यात्मिक पृष्ठभूमि की जानकारी दी. ज्ञातव्य है कि मुख्य मंदिर के आसपास तीस छोटे-बड़े मंदिर भी स्थित हैं.  

कहा जाता है कि चार धामों में शुमार “श्री जगन्नाथ मंदिर” की अनेक विशेषताएं हैं, जिनके विषय में जानकर अचरज में पड़ जाना अस्वाभाविक नहीं है. मसलन, मंदिर का रसोईघर दुनिया का सबसे बड़ा रसोईघर है; इस विशाल रसोईघर में भगवान जगन्नाथ को चढ़ाए जाने वाले महाप्रसाद को तैयार करने के लिए 500 रसोइए एवं उनके 300 सहयोगी एकसाथ काम करते हैं; मिट्टी के बर्तनों में सारा खाना पकाया जाता है; रसोईघर  में प्रसाद पकाने के लिए मिट्टी के सात बर्तन एक-दूसरे पर रखे जाते हैं तथा  इंधन के रूप में लकड़ी का ही इस्तेमाल किया जाता है;  दिन के किसी भी वक्त मंदिर के मुख्य गुंबद की छाया अदृश्य ही रहती है; पुरी शहर के किसी भी भाग से आप मंदिर के शीर्ष पर लगे सुदर्शन चक्र को देखें तो यह चक्र आपको हमेशा सामने से ही लगा हुआ दिखाई पड़ेगा; 214 फुट ऊँचे इस मंदिर के ऊपरी हिस्से में दिखने वाला ध्वज हमेशा हवा के विपरीत दिशा में लहराता रहता है आदि.

जानने योग्य बात यह भी है कि अष्टधातु से निर्मित सुदर्शन चक्र को, जिसकी परिधि करीब 36 फुट है, नीलचक्र भी कहा जाता है एवं इसे बहुत ही पवित्र -पावन माना जाता है. ऐसी और भी अनेक ज्ञानवर्द्धक  बातें इस मंदिर के साथ जुड़ी है.

मंदिर के गर्भ गृह में एक रत्न मंडित चबूतरे पर भगवान जगन्नाथ के साथ उनके बड़े भाई बलभद्र और उनकी बहन सुभद्रा की मूर्तियां विराजमान हैं. ये तीनों मूर्तियां लकड़ी से बनी हैं, जिन्हें अनुष्ठानपूर्वक बारह वर्षों में एक बार बदला जाता है. 

मंदिर के शिखर पर लहराते ध्वज को बदलने का कठिन काम प्रतिदिन अपराह्न काल में करीब चार बजे के आसपास, यानी सूर्यास्त से पहले, किया जाता है. मंदिर के शिखर पर स्थित सुदर्शन चक्र के ऊपर सूर्य और चन्द्र अंकित लगभग 25 फुट लम्बा लाल या पीला एक बड़ा ध्वज लगाया जाता है, जो करीब 12 फुट ऊँचे सुदर्शन  चक्र से करीब 25 फुट और ऊपर सदैव लहराता रहता है. नील चक्र से नीचे की ओर अन्य अनेक छोटे –बड़े ध्वज लटकते –लहराते रहते हैं. सभी ध्वजों को रोज बदला जाता है. सौभाग्य से हमें इस पूरी प्रक्रिया को संपन्न होते हुए देखने का मौका मिला. हमारे तरह हजारों लोग इस रोमांचक दृश्य को देखने वहां मौजूद थे. कहते हैं, ऐसी भीड़ वहां उस वक्त हर रोज देखी जा सकती है. वाकई, इतनी ऊंचाई पर इतने ध्वजों को लेकर चढ़ना-उतरना, उन्हें उतारना–नए ध्वज लगाना,  बहुत ही जोखिम का काम है, तथापि इस कार्य को बड़ी कुशलता से मंदिर द्वारा अधिकृत दो व्यक्ति रोजाना नियमपूर्वक  करते हैं. मंदिर परिसर में ही “श्री जगन्नाथ जी” का प्रसाद प्राप्त करने की सुविधाजनक व्यवस्था कायम है.            (hellomilansinha@gmail.com)

                  और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 

Wednesday, February 15, 2017

यात्रा के रंग : ‘श्री जगन्नाथ मंदिर’ और उसके आसपास -1

                                                                                           - मिलन सिन्हा 
पुरी में सागर तट के पास स्थित अपने होटल में सुबह-सुबह स्नानादि से निवृत होकर हम चल पड़े विश्व प्रसिद्ध श्री जगन्नाथ मंदिर की ओर. यहां से मंदिर जाने के एकाधिक मार्ग हैं. हमने गलियों से गुजरते रास्ते  को चुना जिससे वहां के सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश की कुछ झलक मिल सके. गलियां आवासीय मकानों के बीच से होती हुई निकलती हैं. कस्बाई रहन-सहन. लोग सीधे-सादे. आपस में सटे-सटे ज्यादातर एक मंजिला- दो मंजिला मकान. कुछेक घरों में सामने के एक-दो कमरों में चलते दुकान. इन दुकानों में आम जरुरत की चीजें सुलभ हैं. यहाँ के निवासियों के अलावे सामान्यतः ऐसे गलियों का इस्तेमाल मंदिर तक पैदल आने-जाने वाले भक्तगण करते हैं. गलियों में टीका-चंदन लगाये खाली पैर चलते अनेक लोग दिखते हैं. स्थानीय उड़िया भाषा के अलावे पुरी के आम लोग हिन्दी और बांग्ला भाषा समझ लेते हैं, कई लोग बोल भी लेते हैं. 

मंदिर के आसपास फैले बाजार में पूजा-अर्चना की सामग्री से लेकर पीतल-तांबा-एलुमिनियम-लोहा-चांदी आदि के बर्तन व सजावट की वस्तुएं फुटपाथ तथा बड़े दुकानों में मिलती हैं. हैंडलूम के कपड़े एवं पोशाक का एक बड़ा बाजार है पुरी. यहां की बोमकई, संबलपुर एवं कटकी साडियां महिला पर्यटकों को काफी पसंद आती हैं. इसके अलावे हेंडीक्राफ्ट के कई अच्छे कलेक्शन भी उपलब्ध हैं. सुबह से रात तक यहाँ बहुत चहल-पहल रहती है. पर्व -त्यौहार  के अवसर पर तो यहाँ बहुत भीड़ और चहल-पहल  होना स्वभाविक है. मंदिर  के सामने यातायात को कंट्रोल करते कई पुलिसवाले हैं. यहां-वहां चौपाया पशु भी दिखते हैं.

बताते चलें कि पुरी में दूध से बनी मिठाइयों की क्वालिटी बहुत अच्छी है और ये सस्ती भी हैं. इससे यह अनुमान लगाना सहज है कि पुरी और उसके आसपास दूध प्रचूर मात्रा में उपलब्ध है. हो भी क्यों नहीं, हमारे श्री जगन्नाथ अर्थात श्री कृष्ण अर्थात श्री गोपाल को दूध, दही, मक्खन इतना पसंद जो रहा है. फिर, उनके असंख्य भक्तों के पीछे रहने का सवाल कहां. हाँ, एक बात और. मौका  मिले तो राबड़ी, रसगुल्ला व दही का स्वाद जरुर लें. मंदिर के आसपास इनकी कई दुकानें हैं.  

करीब चार लाख वर्ग फुट क्षेत्र में फैले श्री जगन्नाथ मंदिर परिसर में प्रवेश के लिए सुरक्षा के मानदंडों का पालन अनिवार्य है. मोबाइल, कैमरा आदि बाहर बने काउंटर पर जमा करके ही अन्दर जाने की अनुमति है. मंदिर में प्रवेश के लिए चार द्वार हैं. पूर्व दिशा में स्थित है सिंह द्वार, जिसे मंदिर का मुख्य द्वार भी कहते हैं. पश्चिम द्वार को बाघ द्वार, उत्तर को हाथी द्वार और दक्षिण ओर स्थित द्वार को अश्व द्वार कहा जाता है.
...आगे जारी.                                (hellomilansinha@gmail.com)

                     और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 

Saturday, February 4, 2017

लघु कथा : वास्तविकता

                                                                  - मिलन सिन्हा 
clipकुमार साहब एक नामी  वकील थे. जब वे अदालत में जाते तो अपनी दलीलों से सबको निरुत्तर कर देते.

आज वकील साहब ने दहेज़ के खिलाफ  जोरदार दलीलें प्रस्तुत की . जज साहब सहित न्यायालय में उपस्थित सारे लोग वकील साहब के तर्कों से अभिभूत थे. 

बाहर निकलते ही उनके मुवक्किल प्रसाद जी ने उन्हें ख़ुशी –ख़ुशी एक हजार रूपये दिए. वकील साहब ने पैसे रख लिए और फिर प्रसाद जी  को अलग ले जाते हुए कहा, ‘भैया, आप मुझे परसों तक पचास हजार रूपये उधार दे सकते हो ? बड़ा  जरुरी काम है .

‘हाँ, हाँ , वकील साहब. पचास हजार क्यों, और भी रुपये की जरुरत हो तो ले लीजिये......’ प्रसाद जी ने निःसंकोच जवाब दिया .

पूरी रकम के साथ प्रसाद जी दूसरे ही दिन शाम को वकील साहब के घर पहुंच गए . कुमार साहब बाहर बरामदे में चिंतामग्न बैठे थे. प्रसाद जी को देख कर उन्होंने दूसरी कुर्सी मंगवाई. चाय के लिए भी कहा. प्रसाद जी ने रूपये वकील साहब को दे दिए. फिर कुछ सहमते हुए पूछ ही लिया, ‘जनाब, आपको पहले कभी इतना चिंताग्रस्त नहीं देखा है. सब खैरियत तो है ?

वकील साहब के चेहरे पर एक अजीब- सा भाव साफ़ उभर आया. धीरे से कहा उन्होंने, ‘प्रसाद जी, जानते हैं, ये रूपये मैं आपसे क्यों उधार  ले रहा हूँ ? नहीं  न ! दहेज़ के लिए ! कल देना है मुझे दहेज़ की पूरी रकम, तब जाकर कहीं मेरी बेटी की शादी की तिथि तय हो पायेगी.’

चाय आ चुकी थी, पर प्रसाद जी सुन्न बैठे रहे कुछ देर. फिर चुपचाप उठकर चले गए .
  
               और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 
# लोकप्रिय अखबार 'प्रभात खबर - "सुरभि " में  22 जनवरी , 2017 को प्रकाशित 

Friday, January 20, 2017

यात्रा के रंग : अब भुवनेश्वर की ओर - 1

                                                                                    - मिलन सिन्हा 
सुबह सात बजे ही निकल पड़े हम पुरी से ओड़िशा या उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर की ओर जिससे भुवनेश्वर तथा उसके आसपास अवस्थित कुछेक पर्यटन स्थलों को देखने एवं उनके विषय में अपना ज्ञानवर्धन करने का मौका मिल सके. धूप खिल चुकी है. मौसम खुशनुमा है ...

पुरी शहर से निकल कर भुवनेश्वर मार्ग पर आने के लिए हम एक पुराने पुल से गुजरते हैं. कार चालाक ने बताया कि  इस पुराने पुल के साथ अब अब एक नया पुल भी बन गया है, पर नाम वही पुराना ही है -  ‘अट्ठारह पाया पुल’.

पुरी –भुवनेश्वर सिक्स लेन सड़क पर चलते हुए हमें आसपास धान के खेत, नारियल के हजारों कतारबद्ध पेड़, कच्चे-पक्के छोटे मकान, मुर्गी-बत्तक, गाय, बकरी, पोखर आदि के साथ-साथ सामन्य देहाती लिबास में औरत, मर्द और बच्चे दिखाई पड़े. सड़क किनारे छोटे चाय दुकानों में या उसके आसपास नारियल पानी यानी डाब सुलभ था.  ताजे और सस्ते. नारियल पानी पीकर एवं उसका मलाई खाकर हमलोग आगे बढे. 

पुरी से भुवनेश्वर के बीच की करीब 60 किलोमीटर की दूरी एक्सप्रेस मार्ग से करीब 75-80 मिनट में आराम से तय की गई. कहना न होगा कि भुवनेश्वर शहर में प्रवेश करते ही हमें यह महसूस होने लगा कि हम पौराणिकता एवं आधुनिकता को समेटे एक बेहतर व विकसित स्थान में भ्रमण  का आनंद  ले पायेंगे.

कुछ ही देर में हम उदयगिरि तथा खंडगिरि गुफाओं के पास थे, जो ऐतिहासिक एवं  धार्मिक रूप से भी महत्वपूर्ण माने जाते हैं. दिलचस्प तथ्य यह है कि सड़क के एक ओर खंडगिरि पर्यटन स्थल है तो दूसरे तरफ उदयगिरि. दोनों के बीच करीब 60-70 फीट की दूरी है. ये दोनों पर्वत गुफाएं भुवनेश्वर शहर के उत्तर-पश्चिमी भाग में है. खंडगिरि पर्वत गुफा की ऊंचाई 133 फीट है, तो उदयगिरि की 110 फीट. उदयगिरि में कुल 44 गुफाएं हैं, जब कि खंडगिरि में 19 गुफाएं. कहा जाता है कि इनमें से  कुछ गुफाएं प्राकृतिक हैं. तो कुछ कृत्रिम रूप से निर्मित. दोनों ही पर्वत गुफाओं के आसपास हजारों छोटे- बड़े पेड़ इनकी खूबसूरती बढ़ाते हैं. आइये देखें दोनों पर्वत गुफाओं के ये फोटो :

खंड गिरि पर चढ़ने- उतरने की व्यवस्था बेहतर है. बच्चों, युवाओं  और  बुजुर्गों को भी पर्वत के शिखर पर चढ़ते और उस स्थान का आनंद लेते देखा जा सकता है. उदय गिरि गुफाओं को देखने के लिए कुछ दूर तक आप सीढ़ियों से चढ़ कर अच्छी तरह ऊपर जा सकते हैं, किन्तु बाकी की चढ़ाई पत्थर की बेतरतीब सीढ़ियों से संभल-संभल कर. उदय गिरि के शिखर पर एक सफ़ेद खूबसूरत दिगम्बर जैन मंदिर  है, जो दूर से ही दिखाई पड़ता है. इस मंदिर के परिसर से भुवनेश्वर शहर का एक विहंगम दृश्य आप देख सकते हैं. 

उदय गिरि पर्वत गुफाओं को देखने के क्रम में आपको कुछेक मिनट तो बंदरों के साथ गुजारना ही पड़ेगा, जो आपके लिए एक सुखद अनुभव होगा. ये बंदर – छोटे-बड़े सभी, आपके साथ कमोबेश शालीनता से ही पेश आयेंगे, अगर आप भी उनके साथ मानवोचित व्यवहार करें. आप उन्हें उपहार स्वरुप खाने के लिए बादाम के दो-चार छोटे पैकेट प्रेम से भेंट करें – उन्हें अच्छा लगेगा और यकीनन आपको भी. 

हाँ, इसी क्रम में हमें उनके बीच के आत्मीय रिश्ते के कई दुर्लभ दृश्य अपने मोबाइल कैमरे में कैद करने का अवसर मिल गया, जिसमे एक वयस्क बंदर दूसरे के शरीर में से ढील यानी जुएँ बीनते दिखता है, तो एक दूसरे दृश्य में माता बंदर अपने छोटे से बच्चे को अपनी गोद में सुरक्षित दूध पिलाते हुए. कुछ ऐसे ही आत्मीय दृश्य हमें हमारे कई प्रदेशों के ग्रामीण इलाकों में दोपहर बाद अनायास ही दिख जायेंगे, बेशक कई फर्क के साथ.


यहाँ हमने कई युवक –युवतियों के अलावे कई बुजुर्गों को बंदर एवं उनके परिजनों  के साथ  सेल्फी लेते भी देखा. अपने पूर्वजों की मौजूदा पीढ़ी के साथ दिखने –दिखाने का अभिनव दृश्य !
 (hellomilansinha@gmail.com)

               और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं